मैं सभीको महान बनाना चाहता हूँ

बच्चों की नजर, उनकी सोच तीन अंगुल तक की होती है । कोई भी स्वादु वस्तु आयी, जीभ के स्वाद के लिए खा लिया । क्या परिणाम आयेगा यह नहीं सोचते ।

बड़ों की नजर, उनका सोच-विचार तीन हाथ तक होता है । पूरे शरीर का ख्याल करके खाते व व्यवहार करते हैं ।

साधक की नजर, उसका सोच-विचार तीन जन्म तक का होता है - इस जन्म का, बीते हुए जन्मों के कर्म काटने का और आनेवाले भविष्य को उज्ज्वल करने का । ‘ऐसे कर्म करूँ कि पूर्व जन्मों के संस्कार मिट जाये और यहाँ सुख-दुःख में सम रहूँ, मान-अपमान को सपना समझूँ, परमेश्वर को अपना समझूँ, मरने के बाद किसीके गर्भ में न भटकूँ, आत्मा-परमात्मा को जानकर मुक्तात्मा हो जाऊँ ...’- यह साधक की नजर है ।

मैं बच्चों को, बड़ों को - सभीको ‘साधक’ बनाना चाहता हूँ । सभीको तीन जन्म का ख्याल करनेवाले महान आत्मा के रूप में देखना चाहता हूँ । साधक ही आगे चलकर सिद्ध बनता है ।

सिद्ध की, ब्रह्मवेत्ता की नजर होती है- ‘संसार सपना है । जो पहले था, अभी है और बाद में रहेगा, वह आत्मस्वरूप ही अपना है ।’

ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर, कार्य रहे ना शेष ।

मोह कभी न ठग सके, इच्छा नहीं लवलेश ।।

पूर्ण गुरु किरपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान ।

आसुमल...

जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति चेते,

ब्रह्मानन्द का आनन्द लेते ।

जाग्रत अवस्था आयी-चली गयी, गहरी नींद आयी-चली गयी, सपना आया-चला गया लेकिन जो कभी नहीं गया, वही मेरा आत्मा-परमात्मा है, नित्य स्वरूप है ।

गुरु नानकजी, संत कबीरजी, स्वामी लीलाशाहजी महाराज अपनेको ‘आत्मा’ जानते थे, वही ‘आत्मा’ तो तुम भी हो । उन्होंने जान लिया तो ब्रह्मज्ञानी बन गये, तुम्हें जानना बाकी है तो ‘साधक’ हो और यदि नहीं जानोगे तो संसार में फिर गोते खाने पड़ेंगे ।

जब पाँच साल का ध्रुव भगवान को प्रकट कर सकता है, आठ साल का रामीरामदास हनुमानजी को प्रकट कर सकता है, सुलभा, मदालसा, गार्गी इतनी महान हो सकती हैं तो आप भी अपने आत्मस्वरूप को जानकर महान बन सकते हो ।

वह कौन-सा उकदा है, जो हो नहीं सकता ?

तेरा जी न चाहे, तो हो नहीं सकता ।।

छोटा-सा कीड़ा, पत्थर में घर करे ।

तो इनसान क्या, दिले-दिलबर में घर न करे?