वास्तविक विजय

आजकल तो दूसरों का कुछ ख्याल नहीं रखा जाता, जैसे भी हो बस विजय मिले, सफलता मिले । वास्तविक विजय शत्रु को, लोगों को दबा देने से नहीं मिलती । यदि हमने उन्हें दबा दिया तो उनका दबा हुआ द्वेष कब हमको पराजय की खाई में गिरा दे कोई पता नहीं । किसीका शोषण कर आप विजयी बन गये यह धर्म-परायण विजय नहीं है क्योंकि इससे धर्म का लाभ- संतोष, तृप्ति नहीं मिली, धर्म का फल परमात्मशांति नहीं मिली; भोग मिला । फिर वह भोग छीना जायेगा तब बहुत परेशानी होगी ।

 

शोषक वृत्ति से बुद्धि मारी जायेगी । धर्म का आश्रय लिये बिना पद, प्रतिष्ठा की तरफ चले तो संघर्ष, अन्याय, दुःख बढ़ेगा । वास्तविक विजय वह है जिसमें अपना व दूसरों का हित हो । भले तात्कालिक परिणाम न भी दिखे परंतु समय पाकर दोनों का हित हो ।

व्यक्तिगत स्वार्थ का त्याग करके सत्यवादी, कर्तव्य-परायण, हितैषी, कार्यकुशल और तत्पर बननेवाले व्यक्ति को सफलता, न्याय व विजय वरण कर लेती है ।

चंदन की चुटकी भली, गाड़ी भली न काठ ।

बुद्धिमान एक ही भलो, मूरख भला न साठ ।।

बुद्धिमान अकेला हजारों, लाखों का भला कर सकता है लेकिन साठ मूर्ख मिलकर भी उतना भला नहीं कर सकते हैं । बुद्धिमान कौन है ? जो धर्म का पालन करे अर्थात् जो कठिनाई के बीच भी अपना सत्कर्तव्य पालता रहे और भगवान से प्रीति करते-करते परमात्मसुख की प्राप्ति कर ले ।      पूज्य बापूजी