स्वाभाविक कर्म ही परमेश्वर की पूजा

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है -

 

स्वेस्वेकर्मण्यभिरतःसंसिद्धिंलभतेनरः ।

स्वकर्मनिरतःसिद्धिं यथा विन्दतितच्छृणु ।।

यतःप्रवृत्तिर्भूतानांयेनसर्वमिदंततम् ।

स्वकर्मणातमभ्यर्च्यसिद्धिंविन्दतिमानवः ।।

अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्तिरूप परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता है । अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परम सिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू सुन । जिस परमेश्वर से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता है ।’

(गीता - 18.45-46)

संत कबीरजी इतने प्रेम से ताना बुनते थे कि मानों पूजा कर रहे हैं । राम के लिए ही रुई खरीदते थे, राम के लिए ही धागा बनाते थे और राम के लिए ही कपड़ा बुनते थे । वे जब बाजार में जाते थे तो लोग हैरान हो जाते कि इतना बढ़िया कपड़ा ! कबीरजी कम मुनाफा रखते और जिनके लिए कपड़ा बुनते उन ग्राहकों में राम को निहारते थे । ताना बुननेवाला और ताना जिसके लिए बुना जाता है वे दोनों एक ही हैं । कबीरजी कर्म करते हुए मुक्ति का अनुभव करते थे ।

ऐसे महापुरुष स्वयं तो धन्य हो जाते हैं, साथ ही दूसरों के लिए भी धन्य होने का मार्ग खुला कर देते हैं ।

संत नामदेवजी के यहाँ बहुत साधु-संत आते थे । राजाई उन लोगों के लिए भोजन बनाती थी । उनको भोजन कराते हुए दोपहर के तीन-चार बज जाते । स्वयं भूखे होते हुए भी उन्हें भोजन कराने में जो आनंद आता उसमें वह समाधि का सुख महसूस करती थी ।

गोरा कुम्हार जब मटका बनाते थे तब ऐसा कभी नहीं सोचते कि मटका जल्दी टूटे और ग्राहक दूसरा खरीदे । वे तो ऐसे मजबूत मटके बनाते कि पिता खरीदे उसमें पुत्र-पौत्र भी पानी पीयें । ‘जिनके लिए बना रहा हूँ वे रामजी हैं’- ऐसा विचारकर मिट्टी रौंदते थे । मटके को बराबर पकाने के लिए आँच भी कुशलता से देते थे ।

कर्म करने का अपना आनंद होता है । जब कर्म में स्वार्थ होता है, अहंकार होता है या उबान होती है तब कर्म बोझिल बन जाता है । जब कर्म में कर्तव्य-बुद्धि होती है तब वही कर्म सिद्धि देनेवाला बन जाता है ।

मनुष्य स्वकर्म में निःशेष रत रहने से, अपना कर्म ठीक तरह करने से परमेश्वर को संतुष्ट करके उनके प्रसाद से सिद्धि को प्राप्त होता है ।

उद्देश्य ईश्वरप्राप्ति हो; बेईमानी, कपट, भोग-संग्रह नहीं हो, अहंकार का अभाव हो और पूरी लगन व निष्ठासे कर्म किया जाय तो परमात्मा की पूजा हो जाती है । संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति नारायण से ही हुई है । सभी परमात्मा के ही रूप हैं ।

सब मम प्रिय सब मम उपजाए ।

अग्निर्मूर्धाचक्षुषीचन्द्रसूर्यौ

दिशःश्रोत्रेवाग्विवृताश्चवेदाः ।

वायुःप्राणोहृदयंविश्वमस्य

पद्भ्यांपृथिवीह्येषसर्वभूतान्तरात्मा ।।

तस्माच्च देवा बहुधा सम्प्रसूताः

साध्यामनुष्याःपशवोवयांसि।

प्राणापानौ व्रीहियवौ तपश्च

श्रद्धा सत्यंब्रह्मचर्यंविधिश्च ।।

अग्नि परमेश्वर का मस्तक है, चंद्रमा और सूर्य दोनों नेत्र हैं, दिशाएँ दोनों कान हैं, वेद उनकी वाणी है, वायु प्राण है, जगत हृदय है, इनके दोनों पैरों से पृथ्वी उत्पन्न हुई है । ये ही समस्त प्राणियों के अंतरात्मा हैं और उसी परमेश्वर से वसु, रुद्र आदि अनेक भेदोंवाले देवता, साध्यगण, मनुष्य, पशु-पक्षी, प्राण-अपान वायु, धान, जौ आदि अन्न तथा तप, श्रद्धा, सत्य, ब‘ह्मचर्य एवं यज्ञ आदि के अनुष्ठान की विधि भी प्रकट हुए हैं ।’

(मुंडकोपनिषद् - 2.1.4, 7)

जीवन में करने की, मानने की और जानने की शक्ति सबके पास है । कर्म अगर उचित हो तो मनुष्य कर्म से परमेश्वर की पूजा करके मुक्त हो सकता है । मानने की शक्ति का सदुपयोग हो तो मन जहाँसे सारी मान्यताएँ लाता है उस परमेश्वर में विश्रांति मिल जाय । जानने की शक्ति का सदुपयोग हो तो ऐसे तत्त्व को जान सकते हैं, जिसे जानने के बाद और कुछ जानना शेष नहीं रहता ।

मनुष्य में कर्म करने की शक्ति तो विपुल है मगर कर्म करने का तरीका वह नहीं जानता तो फिर उन कर्मों के द्वारा बँध जाता है ।

विद्युत का हम सदुपयोग करते हैं तो प्रकाश, पंखा, फ्रीज, लिफ्ट आदि से हमारा दैनिक व्यवहार चलता है । गलती से कहीं प्लग में उँगली डाल दें तो विद्युत से मृत्यु भी हो सकती है । कर्म करने का सही तरीका आ जाय तो मनुष्य कर्म के द्वारा मुक्त हो सकता है ।

कर्म करते समय उत्साह हो और कर्म जिसके लिए करें उसके प्रति प्रेम हो । प्रेम नहीं है तो कर्म बोझ बन जायेगा । प्रेम है तो कर्म पूजा बन जाता है । कर्म में ऐसा उत्साह हो, ऐसी कुशलता हो कि कर्म करते वक्त आप कर्म ही बन जायें । टूटे, रूखे मन से नहीं, जो काम करें पूरे दिल से करें । जो पूरे दिल से काम नहीं करता वह पूरे दिल से ध्यान भी नहीं कर सकता । जो करो वह पूरा करो । भगवान को प्यार करो, उनका ध्यान करो तो पूरा करो, अपने-आपको बचाकर नहीं । जो कर्म में पूरा उतर आता है उसका आत्मविकास होता है, उसकी योग्यताओं का विकास होता है । जो टूटे-फूटे दिल से कर्म करता है उसको कर्म करने का रस नहीं आता, आनंद नहीं आता । उसका कर्म पूजा नहीं बन पाता, बंधन बन जाता है, बोझ बन जाता है ।

 उत्कृष्ट कर्म करने की कुंजी यह है कि कर्म करने की रुचि हो, जिसके लिए कर्म कर रहे हैं उसके प्रति प्रेम हो । कर्म के फल को तुच्छ विकारों में नाश न करके जीवन ऊर्ध्वगामी हो, अविनाशी आत्मा का ज्ञान हो - इस भाव से कर्म करो । कर्म के फल की लोलुपता हृदय को कुंठित न करे, यह सावधानी रहे तो कर्म आत्मसिद्धि (आत्मज्ञान) देनेवाला होता है। उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार बनाकर ईश्वरप्राप्ति के लिए कर्म करे तो कर्म कर्मयोग हो जाता है । उद्देश्य अगर भोग-संग्रह, दूसरों को नीचा दिखाना, अपना अहंकार पोसना हो तो वही कर्म कर्मबंधन हो जाता है ।

 समाज के तेजस्वी होने और न होने में यही कारण है । समाज के निस्तेज लोग कर्म में रुचि नहीं रखते और जिनके लिए कर्म करते हैं उनके लिए प्रेम नहीं रखते । उनके जीवन में रस नहीं होता, जीवन में संगीत नहीं गूँजता; जीवन शुष्क हो जाता है ।

कुत्ते को भी जो काम सौंप देते हैं उसे वह तत्परता से करता है तो उसकी कीमत होती है, बाकी फालतू कुत्तों को तो पत्थर ही लगते हैं । ऐसे ही जंगली लोगों को तो धक्के ही मिलते हैं और जो तत्परता से ईश्वरप्राप्ति का उद्देश्य बनाकर कर्म करते हैं, जैसे धन्ना जाट, संत रविदास, शबरी भीलन, नामदेवजी, राजा जनक आदि उनको परमात्मसुख की प्राप्ति हो जाती है ।

भारत में तो अति लापरवाही हो गयी है । यहाँ लोग न कर्म करने में कुशल हैं, न साधना में कुशल हैं । विदेश के लोग कर्म में तो कुशल हैं, साधना का उन बेचारों को पता ही नहीं । हमारे यहाँ साधना का इतना सुगम रास्ता है लेकिन लोग इतने लापरवाह हो गये, इतने सुस्त व आलसी हो गये कि अब देश की स्थिति क्या होगी भगवान जाने ! देश की स्थिति तो चिंताजनक है ही, उससे भी ज्यादा चिंताजनक व्यक्ति की स्थिति है ।

जब आपका तन, मन और जीवन दूसरों के काम आता है तो लोग आप पर सब कुछ न्योछावर कर देते हैं । अगर आप विश्वंभर के काम आओगे तो वह आपको अपने दिल में रखेगा ।

ऐसा कौन-सा नौकर है जो सेठ के काम आता हो और उसे रहने की जगह न मिले, रोटी न मिले, कपड़ा न मिले ? परंतु जो नौकर सेठ के घर रहकर अपने लिए ही चिंतित रहे, सेठ के काम के लिए रुचि न रखे, सेठ के प‘ति प्रीति न रखे वह सेठ का कृपाभाजन नहीं होपाता । ऐसे ही सेठों का सेठ जो परमात्मा है उसके घर को माना संसार को सत्संग के द्वारा, सत्कर्मों के द्वारा सजायें-सँवारें और मधुर बनायें तो वह आपके हृदय को भी मधुर बना देगा, उसमें परमात्मसुखप्रकटा देगा ।