चमत्कार का विज्ञान

श्री तैलंग स्वामी जयंती : 24 जनवरी

जिसके मन-बुद्धि जितने अंश में उस परब्रह्म-परमात्मा के करीब पहुँचते हैं, उसके द्वारा उतनी ही कुछ कल्पनातीत घटनाएँ घट जाया करती हैं, जिन्हें लोग चमत्कार कहते हैं । चमत्कार भी इसलिए कहते हैं क्योंकि वे सामान्य मानव की समझ में नहीं आतीं, अन्यथा वह पूर्ण तत्त्व सबके पास उतने-का-उतना, पूरे-का-पूरा है ।

संतों की महत्ता व उनके दर्शन और सत्संग से क्या लाभ होते हैं इसको खोजनेवाले तैलंग स्वामी गंगा-किनारे घाट पर बैठे थे । अचानक बरसात होने लगी । सारे लोग तितर-बितर हो गये पर बाबाजी भीगते रहे । वे तो परमहंस अवस्था में रहते थे, लँगोटी भी धारण नहीं करते थे । ऐसे फक्कड़ थे कि ‘दिशाएँ मेरे वस्त्र हैं, सारी सृष्टि मेरा वस्त्र है’ ऐसे निर्विकार भाव से बैठे थे । गर्मी-सर्दी को उन्होंने अच्छी तरह से पचा लिया था ।

किसी ब्राह्मण को सद्भाव जगा कि ‘संत पानी में भीग रहे हैं !’ तो बाबा को हाथ जोड़कर बोला : ‘‘बाबा ! बारिश में यहाँ भीगते हो, चलो मेरे घर पर ।’’

‘‘मुझे इन चीजों से कोई फर्क नहीं पड़ता ।’’ बाबा ने ऐसा कहा तो ब्राह्मण देखता रहा ।

बाबा ने कहा : ‘‘यहाँ मैं विशेष कार्य से बैठा हूँ । सामने जो नाव आ रही है वह अभी डूब जायेगी, बेचारे यात्रियों को बचाना है । तुम आग्रह नहीं करो, मैं तुम्हारे साथ नहीं चलूँगा ।’’

देखा तो नाव आ रही थी । बीच भँवर में नाव हिली-डुली और देखते-देखते सचमुच में डूब गयी । नाव डूबी तो ब्राह्मण हक्का-बक्का रह गया । तैलंग स्वामी देखते-देखते अंतर्धान हो गये । फिर थोड़ी देर में देखा तो नाव बाहर आ रही है । बाबा उन यात्रियों के बीच बैठे दिखे । नाव किनारे लगी । ब्राह्मण ने तैलंग स्वामी को प्रणाम किया । उसने आश्चर्य व्यक्त किया तो तैलंग स्वामी ने कहा : ‘‘आश्चर्य मत करो । जीव इन्द्रियों और मन के वश होकर संसारी हो के अपनी महिमा खो देता है, फिर भी जीव ईश्वर का अविभाज्य स्वरूप है । ईश्वर का संकल्प होता है तो सृष्टि बनती है तो मेरे संकल्प से यह नाव बाहर आ जाय और मैं नाव में बैठा दिखूँ तो क्या बड़ी बात है ! सब हो सकता है, आश्चर्य न मानो ।’’

लेकिन महापुरुषों की महानता चमत्कारों में निहित नहीं है, उनकी महानता तो उनकी ब्रह्मनिष्ठा में निहित है । वास्तविक ज्ञान, इन्द्रियगत ज्ञान, बुद्धिगत ज्ञान और मनोगत ज्ञान - इन सबको जो जानता है वह आत्मदेव है । वह ईश्वरीय ज्ञान है, ईश्वरीय सत्ता है जो सबके अंदर छिपी है । बस, उसको जागृत करने, समझने की देर है; सद्भाव व आदर सहित साधना से समझने की आवश्यकता है । आप चाहें तो आप भी जागृत कर सकते हैं, समझ सकते हैं ।