अम्माजी के पावन प्रसंग

(ब्रह्मलीन मातुश्री माँ महँगीबाजी का महानिर्वाण दिवस: 11 नवम्बर)

श्री माँ महँगीबाजी का स्वभाव अत्यंत नम्र, दयालु, सरल, सेवाभावी एवं ईश्वरभक्ति से परिपूर्ण था । इतना ही नहीं, पुत्र में गुरुबुद्धि करके उन्होंने गुरुतत्त्व को पा लिया था । ऐसी गुरुनिष्ठ तपस्विनी संतमाता के जीवन-प्रसंगों को पढ़ने व मनन करने से मन पावन हो जाता है और मति को दिव्य प्रेरणा मिलती है । और उनके जीवन के बारे में जब ब्रह्मज्ञानी संत पूज्य बापूजी स्वयं बता रहे हों तो फिर कहना ही क्या !

सहनशीलता की मूर्ति

सन् 1998 में जब अम्माजी हयात थीं, तब पूज्य बापूजी ने जाहिर सत्संग में बताया था कि ‘‘मेरी माँ (महँगीबाजी) में सहनशीलता तो मानो कूट-कूटकर भरी है । मेरी माँ की देवरानी-जेठानी उनसे घर का काम भी बहुत करवातीं और बहुत कष्ट भी देती थीं । मेरी माँ को बहुत सहन करना पड़ता था । परंतु मेरी माँ सहती थी तो उनको लाखों लोग अब माताजी कह के पूज रहे हैं । अभी 90 साल की हैं मेरी माँ । वे जितना सुखी हैं, जितनी ऊँचाई को छू रही हैं, मैं तो चाहता हूँ कि दुनियाभर की माताएँ ऐसी ऊँचाई को छुएँ । मैंने कोई ज्यादा मेहनत नहीं की लेकिन जो ब्रह्म-परमात्मा का ज्ञान ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों, जती-जोगियों के लिए दुर्लभ है, उस ब्रह्मज्ञान की अनुभूति मेरी माँ को हो रही है । इसकी मेरे चित्त में बड़ी खुशी है ।

सिंध के बेराणी गाँव में हमारे पास खूब गायें-भैंसें थीं । कोई लस्सी माँगने आता तो उसको माँ मक्खन भी दे देतीं, इससे लस्सी लेनेवालों की कतार लग जाती । भाभियाँ भिड़ातीं कि ‘‘यह करती है, वह करती है...’’, लोग बोलते कि ‘‘यह घर कैसे चलायेगी ?’’ लेकिन माँ ने जो सहन किया है और भलाई की है, उसका फल यह है कि उनके घर में यह (बापूजी) आया ।’’

अम्माजी का सरल हृदय

पूज्य बापूजी बताते हैं : ‘‘किसीके यहाँ कुछ हो जाता तो आसपास के गाँव के लोग मेरी माँ के पास पूछने आते : हमारा ऐसा हो गया है... हमारे बैल खो गये हैं, मिलेंगे कि नहीं मिलेंगे ? हमारी सगाई टूट गयी है, होगी कि नहीं होगी ? हमारी चीज चोरी हो गयी है, घर के लोगों ने किया कि चोर ले गये ?...’ तो मेरी माँ बता देती थी । साफ दिल के जो लोग होते हैं न, उनके द्वारा किसी निमित्त से ऐसा हो जाता है ।’’

आश्चर्य को भी आश्चर्य

23 अक्टूबर 1999 के जाहिर सत्संग में पूज्यश्री ने बताया था : ‘‘मेरी माँ की उम्र 91 साल हो गयी है । स्वाभाविक है जूना-पुराना तन है तो पिछले दो दिन से शरीर की ऐसी स्थिति हो गयी कि अब गयी, अब गयी... । तो मैंने आगरे का कार्यक्रम रद्द तो नहीं किया, एक बार कार्यक्रम दिया तो अब क्या करूँ ? उनकी नाड़ी देखते तो कभी 2, कभी 4 तो कभी 11 धबकारे लगाती और कभी बंद हो जाती । मैं अपने वैद्य को वहाँ छोड़ के आया और आते-आते मैंने मेरी माँ के ललाट को स्पर्श किया और जो कुछ उच्चारण मेरे को करवाना था वह थोड़ा करवाया । मुझे उस परमात्मा की लीला पर बहुत-बहुत नाज हो रहा है कि जो लगभग 2-3 दिन से करीब-करीब कोमा की स्थिति में पड़ी थीं, बाथरूम 2 सेविकाएँ उठाकर ले जाती थीं और बहुत सारी तकलीफें थीं । वैद्य ने कहा : ‘‘10 मिनट में भी माताजी जा सकती हैं ।’’ फिर मैंने अंतरात्मा में तनिक शांत होकर जो भी होती है गुरुकृपा, वह की और वैद्य को कहा कि ‘‘तुम खबर देते रहना ।’’

रात को खबर आयी

तो आश्चर्य को भी आश्चर्य हो जाय कि माताजी उठीं और स्वयं बाथरूम गयीं । वापस आकर ॐ ॐ ॐ... करके हास्य करने लगीं । कुटिया को 3 चक्कर लगाये, कुर्सी पर डेढ़ घंटा बैठीं और आश्रम के बच्चों को बुला के कीर्तन-सत्संग करके उनको आनंदित कर दिया । मैंने कहा, सत्संग-कीर्तन करवाकर आनंदित करने का मेरा काम माँ ने शुरू कर दिया ! वाह भाई वाह !!’’