प्राणायाम के प्रकार

प्राणायाम बहुत प्रकार के होते हैं परंतु ब्रह्मनिष्ठ पूज्य बापूजी लोगों को वे ही प्रयोग, प्राणायाम और साधना बताते हैं जिनमें सबसे अधिक फायदा होता हो और जो करने में सरल हों । आपश्री कहते हैं : ‘‘मेरे गुरुजी 64 प्रकार के प्राणायाम जानते थे और उनका अलग-अलग प्रभाव पड़ता है । इन प्राणायामों को आम जनता को कितना काम में लेना चाहिए उतना ही मैं काम में दिलाता हूँ । सब काहे को करेंगे ! तो ऐसे-ऐसे प्रयोग कराता हूँ इसीलिए मैं दावे के साथ कहता हूँ कि जिन्होंने मंत्रदीक्षा ली है उन्हें 33 से भी अधिक प्रकार के फायदे होकर ही रहते हैं ।

अनुलोम-विलोम प्राणायाम

कोई भी प्राणायाम करने से पहले अनुलोम-विलोम प्राणायाम कर लें । कमर व गर्दन सीधी रखें । जिसको दब्बू बनना है वह झुक के बैठे । फिर दायें नथुने से श्वास लिया, बायें से छोड़ा व बायें से लिया, दायें से छोड़ा, जिससे चन्द्र व सूर्य - दोनों स्वर चलें ।

टंक विद्या का एक प्रयोग

प्राणायाम करनेवालों और सभी साधकों को टंक विद्या का प्रयोग करना चाहिए । बच्चों को भी जो कान में उँगली डाल के ॐकार गुंजनकी साधना सिखाते हैं, उसके पहले भी ये दो प्राणायाम कराने चाहिए ।

लाभ : यह लगता तो साधारण प्रयोग है लेकिन शरीर के 7 केन्द्रों में से यह पंचम केन्द्र को सक्रिय रखता है । नीचे के 4 केन्द्रों की अपेक्षा पाँचवाँ केन्द्र हमें छठे केन्द्र में, जो भ्रूमध्य (भौंहों के मध्य) में है, जल्दी पहुँचा देता है; जिससे नीचे के सभी पाँचों केन्द्रों के विकास का फायदा मिल जाता है । एक-एक केन्द्र पर रुकने के बजाय सीधे पाँचवें में आये फिर छठे केन्द्र में आ गये । जैसे छलाँग लगाते हैं न, पहली सीढ़ी से सीधा चौथी या पाँचवीं पर पहुँच गये । ऐसी ही यह प्राणायाम की विधि बता रहा हूँ छलाँगवाली 

विधि : लम्बा श्वास लेकर होंठ बंद करके कंठ से की ध्वनि निकालते हुए सिर को ऊपर-नीचे करें ।’’    

100 गुना ज्यादा प्रभावशाली: सगर्भ प्राणायाम

प्राणायाम करना तो अति हितकारी है परंतु मंत्रजपसहित प्राणायाम करने की विशेष महत्ता है । पूज्य बापूजी इसकी महत्ता व विधि बताते हुए कहते हैं : ‘‘मंत्रशक्ति में जितना दृढ़ विश्वास होता है, जितनी दृढ़ श्रद्धा होती है और जितनी एकाग्रता होती है, उतना ज्यादा और जल्दी फायदा होता है ।

सत् एक ॐकार है, हरिनाम है और ऐसे मंत्रजपसहित प्राणायाम करने से वह 100 गुना ज्यादा प्रभावशाली होता है ।

सगर्भ प्राणायाम से मनोजय होता है, नाड़ियाँ शुद्ध होती हैं, पाप नष्ट होते हैं, भक्ति पुष्ट होती है, व्यवहार में कौशल्य आता है, अकाल मृत्यु टलती है, दीर्घायु होती है । प्राणायाम में बहुत फायदे हैं लेकिन सगर्भ प्राणायाम करना विशेष हितकारी है । भगवान का नाम मिला दो तो सगर्भ प्राणायाम और नाम मिलाये बिना प्राणायाम करो तो अगर्भ प्राणायाम ।

अगर्भात् गर्भसंयुक्तः प्राणायामः शताधिकः ।

तस्मात्सगर्भं कुर्वन्ति योगिनः प्राणसंयमः ।।

जिन प्राणायामों में श्वास रोककर भगवन्नाम-जप और ध्यान किया जाता है, वे सगर्भ प्राणायामहैं और जो इनसे रहित हैं वे अगर्भ प्राणायामहैं । अगर्भ प्राणायाम में 1 प्रतिशत फायदा होता है तो सगर्भ प्राणायाम में 100 गुना ज्यादा फायदा होता है ।

जैसे अग्नि में धातु डालने से उस धातु के दोष दूर हो जाते हैं, ऐसे ही फेफड़ों में श्वास भर के भगवान का नाम जपते हैं तो सारे नाड़ीतंत्रों के दोष, पाप दूर हो जाते हैं और नाड़ियाँ बलवान हो जाती हैं ।

श्वास भीतर रोकें तो 1 मिनट 15 सेकंड से 1 मिनट 45 सेकंड और बाहर रोकें तो 1 मिनट से 1 मिनट 15 सेकंड रोकें । उस समय सहित भगवान का नाम जपें तो सगर्भ प्राणायाम हो गये । इससे पापों का शमन होता है, मन की चंचलता दूर होती है, मन एकाग्र होता है, बुद्धि में ऋतमाना सत्य को पाने की योग्यता निखरती है । विद्यार्थियों के परीक्षा-परिणाम बढ़िया आयेंगे और पढ़ाई में मन नहीं लगता हो तो मन लगेगा । दूसरे के मन की बात जानना चाहो तो वह भी पता चलने लगेगी थोड़े समय के अभ्यास के बाद । नाड़ियों में जो रोग, बीमारी के कण हैं, वे भी प्राणायाम से दूर होते हैं ।

अगर कोई 41 दिन इस प्रकार प्राणायाम का अभ्यास और सात्त्विक आहार-विहार करे तो उसके जीवन में चमत्कारिक फायदा होता है । 15-15 मिनट सुबह-शाम प्राणायाम करे, फिर 5 मिनट भगवान के ध्यान में शांत हो जाय । भोंदू से भोंदू विद्यार्थी भी दिव्य हो सकता है तो जो अच्छे विद्यार्थी हैं उनका ऐहिक, दैविक और आध्यात्मिक विकास तो स्वाभाविक ही होने लगेगा ।’’

प्राणायाम की कोटि व प्रभाव

पूज्यश्री बताते हैं : ‘‘त्रिशिखी ब्राह्मण के पूछने पर भगवान आदित्य ने कहा : ‘‘प्राणायाम तीन कोटि के होते हैं : उत्तम, मध्यम और अधम । पसीना उत्पन्न करनेवाला प्राणायाम अधम है । जिस प्राणायाम में शरीर काँपता है वह मध्यम है । जिसमें शरीर आसन से ऊपर उठ जाता है वह प्राणायाम उत्तम कहा गया है । अधम प्राणायाम में व्याधि और पापों का नाश होता है । मध्यम में पाप, रोग और महाव्याधि का नाश होता है । उत्तम में मल-मूत्र अल्प हो जाते हैं, भोजन थोड़ा होता है, इन्द्रियाँ और बुद्धि तीव्र हो जाती हैं । वह योगी तीनों कालों को जाननेवाला हो जाता है ।

प्राणायाम का अभ्यास करनेवाला योगी नाभिकंद में, नासिका के अग्र भाग में और पैर के अँगूठे में सदा अथवा संध्या-वंदन के समय मन द्वारा प्राणतत्त्व की धारणा करे तो वह सब रोगों से मुक्त होकर अशांतिरहित जीवन जीता है ।

नाभिकंद में प्राण धारण करने से पेट के रोग नष्ट होते हैं । नासा के अग्रभाग में प्राण धारण करने से व्यक्ति दीर्घायु होता है और देह हलकी होती है । ब्राह्ममुहूर्त में वायु को जिह्वा से खींचकर तीन मास तक पिये तो महान वाक्सिद्धि होती है । 6 मास के अभ्यास से महारोग का नाश होता है ।

रोगादि से दूषित जिस-जिस अंग में वायु धारण की जाती है वह-वह अंग रोग से मुक्त हो जाता है ।’’              (त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्)