विलक्षण है गुरुमंत्र की महिमा

- पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

परमात्मा में जो महापुरुष बैठे हुए हैं, उनके वचन परमात्म-तत्त्व को छूकर निकलते हैं । वे वचन मंत्र होते हैं । उन वचनों का अंतर में मनन करने से जिज्ञासु साधकों का उत्थान होता है । मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा । ऐसा शास्त्रवचन है । मंत्र जपने में जितनी श्रद्धा होगी और जितना उसका अर्थ समझकर जपेंगे, उतना ही अधिक लाभ होगा । गुरुओं के वाक्य, संतों के उपदेश को ठीक से पकड़ेंगे तो संसार-सागर से पार होना कोई कठिन नहीं है, नितांत आसान हो जाता है ।

मंत्रदीक्षा का अर्थ

मंत्रदीक्षा लेने का मतलब है पावर हाउसों का पावर हाउस जो आत्मा-परमात्मा है उससे जुड़ना । शिष्य कहलाने के लिए कोई मंत्र ले ले, वह अलग बात है । शिष्य कहलाना एक बात है और सत्शिष्य होना दूसरी बात है । सत्शिष्य का लक्षण है कि सत्स्वरूप परमात्मा में गुरु जगा रहे हैं तो अपनी ओर से हम आनाकानी न करें । ईश्वर ने कृपा करके मनुष्य-जन्म दिया, गुरु ने कृपा करके मंत्रदीक्षा दी तो हम अपने ऊपर और कृपा करें ।

दूसरी बात जिस दिन से हम गुरु धारण करते हैं, उस दिन से मंत्र के द्वारा, दृष्टि के द्वारा आत्मदेव में जगे हुए उन गुरुदेव की हाजिरी हमारे हृदय में हो जाती है, संबंध हो जाता है । फिर शिष्य शरीर से कितना भी दूर हो लेकिन उसकी प्रार्थना, उसके प्रश्न गुरु तक पहुँच जाते हैं । जैसे एक बर्तन से दूसरे बर्तन में घृत प्रवेश करता है, ऐसे ही गुरु के आध्यात्मिक हृदय से शिष्य के हृदय को पुष्टि मिलती है । कछुआ, मछली बच्चों से दूर होकर भी अपनी दृष्टिमात्र से उन्हें पोस लेते हैं, ऐसे ही गुरु कितने भी दूर हों लेकिन सच्चे हृदय से शिष्य का कोई प्रश्न है या पुकार है तो गुरु का बाह्य शरीर तो नहीं दिखेगा लेकिन गुरु-तत्त्व जो सर्वव्यापक ब्रह्मांड में है, वह रक्षा कर लेता है ।

मंत्रदीक्षा से नया जन्म

गुरुदीक्षा को दुबारा जन्म माना जाता है । माता-पिता ने इस शरीर को जन्म दिया है लेकिन जिस दिन माँ के गर्भ में बच्चा आया, उस दिन माँ को खबर नहीं, बाप को भी नहीं । समय पाकर वह बच्चा महीने-दो महीने का होता है, तब खयाल आता है कि बच्चा है । फिर ज्यों-ज्यों समय बीतता है, त्यों-त्यों वह गर्भिणी स्त्री सँभल-सँभल के कदम रखती है । 9 महीने होते हैं तब बच्चे का जन्म होता है । वह बच्चा माँ-बाप के शरीर से पुष्ट होकर संसार में जन्म लेता है । उसका जन्म व सर्जन होता है तुच्छ चीजों से, रज-वीर्य से । क्षुद्र चीजों से यह शरीर बनता है लेकिन आध्यात्मिक तत्त्व की जब हमें दीक्षा मिलती है, तब हम द्विजहोते हैं अर्थात् हमारा दुबारा जन्म होता है ।

पहले माता-पिता के शरीर से इस स्थूल शरीर का जन्म हुआ, फिर गुरुओं के कृपा-प्रसाद से हम लोगों का जो जन्म होता है वह आध्यात्मिक जन्म होता है । माता और पिता दोनों के दो शरीर मिलकर स्थूल शरीर बनाते हैं लेकिन आध्यात्मिक शरीर को जन्म एक ही गुरु दे देते हैं । इसलिए गुरु को केवल माता या केवल पिता ही नहीं कहा जाता है, गुरु को माता और पिता भी कहा जाता है - त्वमेव माता च पिता त्वमेव... लेकिन माता और पिता कहने पर शास्त्रकर्ता ऋषि को संतोष नहीं हुआ । गुरु ईश्वर के मार्ग पर हमको ले चलने के लिए हमारे साथ बंधु जैसा और सखा जैसा भी व्यवहार करते हैं, जैसे श्रीकृष्ण ने अर्जुन के साथ सखा का व्यवहार करते हुए उसे ज्ञान करा दिया । ऋषि ने कहा - गुरु हमारे माता, पिता, बंधु, सखा, विद्या हैं... फिर भी ऋषि रुक नहीं गये । जिनको परमात्म-तत्त्व का अनुभव हुआ है, उन्होंने ही यह प्रार्थना बनायी है । उन्होंने अपनी कृतज्ञता व्यक्त की है । फिर कहते हैं : गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । मेरे गुरुजी ब्रह्मा भी हैं । ब्रह्मा जैसे सृष्टि का सर्जन करते हैं, ऐसे ही गुरु ने मेरे आध्यात्मिक शरीर को जन्म दिया फिर उसको उपदेश, आदेशों द्वारा हर वर्ष में गुरुपूनम आदि निमित्त के द्वारा पुष्ट किया । मेरे अंदर जो दूषित संस्कार थे उनको गुरुदेव ने जलाया ।

ब्रह्मा होकर सद्संस्कारों की सृष्टि की, विष्णु होकर पालन किया और शिवजी होकर कुसंस्कारों का संहार किया । महेश्वर तक तो कहा, फिर कहते हैं कि महेश्वर का पूजन-अर्चन अच्छा है, सुहावना है, मर गये तो शिवलोक में जायेंगे लेकिन गुरु यहीं आत्मसाक्षात्कार करा देते हैं, ब्रह्मस्वरूप बना देते हैं । इसलिए मेरे गुरु तो साक्षात् परब्रह्म हैं । गुरुर्साक्षात्परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः । तो ऐसे आत्मारामी गुरु, जिनको वेद के वास्तविक तत्त्व का, तात्त्विक स्वरूप का बोध है, युक्ति द्वारा, शास्त्रों द्वारा, स्मृतियों के द्वारा समझाने की जिनके पास योग्यता है, कला है, शिष्य के संशय-छेदन का जिनमें सामर्थ्य है, जिनकी परब्रह्म-परमात्मा में स्थिति है, निष्ठा है ऐसे संतों को श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठकहा जाता है ।

गुरुमंत्र खोले जीवन्मुक्ति के द्वार

ऐसे गुरुओं से मंत्रदीक्षा मिल जाय अथवा मार्गदर्शन मिल जाय और साधक पूरा चल दे तो यहीं, इसी जन्म में परब्रह्म-परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है, वह जीवन्मुक्त होकर जीता है । कोई उनका उपदेश लेकर चला लेकिन पूरा नहीं पहुँचा है तो भी ऐसे शिष्य को कभी नरक में नहीं जाना पड़ता है । नरक उसके लिए खत्म हो गया । थोड़ी-बहुत साधना है तो स्वर्ग में जायेगा और उससे बढ़िया समझ या साधना है तो ऊँचे लोकों में जायेगा । ब्रह्मज्ञान का सत्संग सुना है, उसका मनन किया है किंतु साक्षात्कार नहीं हुआ तो मरने के बाद वह ब्रह्मलोक में जायेगा । ब्रह्माजी के पास जो वैभव व सुविधाएँ हैं, सृष्टि के सर्जन के सामर्थ्य को छोड़कर बाकी का पूरा-का-पूरा सुख-वैभव उसको भोगने को मिलेगा । यह शास्त्रीय बात है, किसी छोटे-मोटे व्यक्ति की कल्पना नहीं है अथवा किसी एक महाराज ने कह दिया है, वह बात नहीं है । अगर उस शिष्य को, साधक को आत्मज्ञान पाने की तीव्रता है तो ब्रह्मलोक के भोग भी उसको तुच्छ लगेंगे । फिर श्रेष्ठ, पवित्र आचरणवाले श्रीमान के, किसी योगी के अथवा किसी ऋषि के घर वह फिर जन्म लेगा और उसे जल्दी ज्ञान हो जायेगा, वह मुक्त हो जायेगा । ब्रह्माजी कल्पपर्यंत रहते हैं । अगर उसे तीव्रता नहीं है तो जब तक ब्रह्माजी हैं, ब्रह्मलोक है तब तक वह रहेगा और फिर अंत में ब्रह्माजी उसको जरा-सा ब्रह्म-उपदेश करेंगे और उपदेश लग जायेगा, वह मुक्त हो जायेगा ।

मरने के बाद भी तीन चीजें आपका पीछा नहीं छोड़तीं - पुण्य आपको स्वर्ग ले जाता है, पाप आपको नरक में ले जाता है और भगवन्नामयुक्त गुरुमंत्र जब तक भगवत्प्राप्ति नहीं हुई तब तक मरने के बाद भी आपको यात्रा करा के भगवान तक ले जाता है । यह गुरुमंत्र की महिमा है । अतः गुरुमंत्र को साधारण न समझें । प्रीतिपूर्वक, आदरपूर्वक, अर्थसहित नियमित जपते जायें । यह आपको परमात्मदेव में, परमात्म-सुख में प्रतिष्ठित कर देगा

 

Ref: RP-247-JULY2020