यह है श्रीकृष्णावतार का रहस्य !

(श्रीकृष्ण जन्माष्टमी : 24 अगस्त)

श्रीकृष्ण जन्मोत्सव बड़ा रहस्यभरा महोत्सव है । समाज में पहले से लेकर आखिरी व्यक्ति का खयाल करके उसके उत्थान के लिए भिन्न-भिन्न आयामों का आविष्कार और स्वीकार करते हुए व्यक्ति की आवश्यकताएँ व महत्ता को समझ के उसका विकास करनेवाला जो परात्पर ब्रह्म हर जगह मौजूद है... सगुण साकार होकर गुनगुनाता, गीत गाता, नाचता, खिलाता और खाता, अनेक अठखेलियाँ करता हुआ, जीव को अपनी महिमा में जगाता हुआ जो अवतार है, उसे श्रीकृष्णावतार कहते हैं ।

ग्वाल-गोपों जैसी लीला का रहस्य

जब पृथ्वी पर अहंकारी और वासना से लिप्त लोगों के हाथ में सत्ताएँ आ गयीं... धर्मसत्ता स्वार्थी लोगों के हाथ में और राज्य-सत्ता प्रजा को निचोड़नेवाले लोगों के हाथ में आ गयी, तब प्रजा का वह आनंद, प्रजा का वह कृष्ण खो गया । प्रजा का वह प्रेम और मुक्त हास्य, स्वातंत्र्य और ‘स्व’ के गीत गुंजाने की क्षमता मारी गयी । श्रीकृष्ण ने देखा कि लोगों को अपने से छोटे मानकर यदि उन्हें उन्नत किया जायेगा तो काम नहीं चलेगा और बड़े मानकर करेंगे तो अवज्ञा करेंगे, लाभ न ले सकेंगे... तो चलो, अपने बराबरी के मान के उनके साथ नाचो, गाओ, गुनगुनाओ ताकि वे कुछ ऊपर उठ जायें ।

जेल में अवतरण का रहस्य

श्रीकृष्ण कोई राजकुमार अथवा राजाधिराज बनकर नहीं रहे हैं । श्रीकृष्ण का जेल में अवतरण हुआ है । हजारों जन्मों से यह जीव कैद में पड़ा है । कैद में पड़े हुए व्यक्तियों से मिलना है तो तुम्हें भी कैद में आना पड़ेगा । जहाँ श्रीकृष्ण कैद में आकर कैदियों को छुड़ा रहे हैं वहीं वे ज्ञानियों के लिए उतने ही पूर्ण स्वतंत्र हैं ।

श्रीकृष्ण में जिनकी जिस समय जैसी दृष्टि होती है उस समय उनको वे वैसे ही भासते हैं क्योंकि श्रीकृष्ण पूर्ण अवतार हैं । श्रीकृष्ण मित्रों को मित्र, चाणूर और मुष्टिक को पहलवान, कंस को काल, योगियों को योगेश्वर, भक्तों को भगवान, गोपियों को अपना प्यारा और वसुदेव को अपने बेटे दिखते हैं । वेदांत कहता है कि ‘वही कृष्ण, वही चैतन्य कहीं बेटा बना है, कहीं प्यारा बना है, कहीं मृत्यु बना है तो कहीं जीवन बना है, कहीं अपना बना है तो कहीं पराया बना है ।’

सनातन धर्म के ऋषियों ने, भारतीय प्रजा ने 33 करोड़ देवता माने हैं । उनमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश को मूर्धन्य, मुख्य माना है । सृष्टि की 3 सत्ताएँ हैं - उत्पत्ति (जन्म), स्थिति (जीवन) और प्रलय (मृत्यु) । इन सत्ताओं के अधिष्ठाता मुख्य 3 देव हैं - ब्रह्मा, विष्णु और महेश । सृष्टि की उत्पत्ति और मौत हम लोगों के हाथ में नहीं है । हम लोगों के हाथ में जीवन है तो उस जीवन में ही हमारे गीत गूँजें और उन गीतों को गुंजाने के लिए आदिनारायण विष्णुजी ने नन्हा-मुन्ना रूप धारण किया, उसी रूप का नाम है श्रीकृष्ण !

श्रीकृष्ण जिस वक्त जो उचित है वह करते हैं ऐसी बात नहीं, श्रीकृष्ण जो करते हैं वह उचित होता है क्योंकि जब अपना (व्यक्तिगत) स्वार्थ अलविदा हो जाता है तो उन ब्रह्मवेत्ताओं के द्वारा जो होता है, उचित होता है ।

गोवर्धन पूजा का रहस्य

समाज में जब सत्ता का, धन का पूजन होने लगता है तो उसकी चकाचौंध में व्यक्ति अंदर की आत्मसत्ता और अंदर का आत्मधन भूल जाता है । इन गलतियों को विनोद व युक्ति से दूर करके व्यक्ति की चेतना जगाने का जो कार्य है वह श्रीकृष्ण की लीला से प्रकट हो रहा है । लोग इन्द्र की अर्थात् धन और सत्ता की पूजा करते थे । कृष्ण ने कहा कि ‘‘हर साल इन्द्र की पूजा करते हो परंतु चलो, आज गोवर्धन की पूजा करें ।’’

‘गो’ उपनिषदों का भी नाम है । उपनिषदों के धन की पूजा अर्थात् आत्मज्ञानी महापुरुषों के चरणों में बैठकर अपने आत्मतत्त्व की पूजा - यह गोवर्धन की पूजा है । बाहर का धन, सत्ता न होने पर भी तुम्हारे पास यदि आत्मज्ञान और समझ है, उत्साह और हिम्मत है तो सत्ता और धन के बल से जो बड़े बन बैठे हैं उनकी परवाह किये बिना तुम महान गोवर्धन की पूजा कर सकते हो । हो सकता है कि सत्ता और धन तुम्हें दबायें, तुम पर मेघ गरजायें, भय दिखायें लेकिन कृष्ण तुम्हारे साथ हैं, आत्मदेव तुम्हारे साथ हैं । तुम छोटी-मोटी अपनी लकड़ियाँ लगाओ और वह भी जरा छोटी उँगली (कनिष्ठिका) अर्थात् अपनी वृत्ति लगा देगा तो बड़े-में-बड़ा पहाड़ जैसा दुःख भी दुःख न देगा, तुम्हारे लिए वह छतरी बन जायेगा ।

ये लीलाएँ देखकर नियम को, कायदों को भी खतरा हुआ कि ‘अब हमारा राज्य किस पर चलेगा ?’ कंस का अंधा कायदा कृष्ण को नहीं पकड़ सकता है । ज्यों पकड़ने की कोशिश करता है त्यों कंस को भागना पड़ता है ।

व्यवहार में बुद्धि का उपयोग होना चाहिए । जिनके पास बुद्धि थी उन्होंने बुद्धि लगा दी शोषण में और जिनके पास भाव था वे भाव से भयभीत हो गये । अब बुद्धिमानों के घर जन्म लेने की जरूरत नहीं है, भावुक भोले-भालों के बीच पैदा होकर विनोद का अवलम्बन लेते हुए, प्रेम का प्रसाद लुटाते हुए उनके अंदर बुद्धि का विकास हो । बुद्धि के विकास को यहाँ तक पहुँचाने का कृष्ण का लक्ष्य होगा कि व्यक्ति फिर जन्म-मृत्यु के चक्कर में न आये, वह अपनी महिमा में जग जाय ।

तो समझ लो कि आपका काम पूरा हो गया

श्रीकृष्ण की बाह्य लीला अथवा चमत्कारों के कारण ही श्रीकृष्ण को सब लोग मानते हैं ऐसी बात नहीं है । चमत्कार होना यह जीवन का आखिरी लक्ष्य नहीं है लेकिन चमत्कार जिस चैतन्य की सत्ता से होता है उस चैतन्य का साक्षात्कार करना यह जीवन का आखिरी लक्ष्य है । श्रीकृष्ण ने सब स्वीकार किया है । कृष्ण को बोलो कि ‘घोड़ागाड़ी चलाओ’ तो बोलेंगे, ‘ठीक है’, ‘माखन चोरी करो, किसीको अँगूठा दिखाओ’ तो ‘ठीक है’ और अभी यदि श्रीकृष्ण आ जायें तो उनको बोलो कि ‘बिगुल बजाओ, ढोल बजाओ’ तो बजायेंगे ।

श्रीकृष्ण के जीवन में देखो तो वल्लभाचार्यजी, रामानंदजी का हृदय, शंकराचार्यजी का तत्त्वज्ञान, कबीरजी की लीला - सब दिख जाता है । जैसे एक ब्रह्म में सारा ब्रह्मांड है, ऐसे ही श्रीकृष्ण के जीवन में समग्र आयाम स्वीकार किये गये हैं । इसलिए श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव हजारों वर्षों बाद भी ताजा है क्योंकि लोकमानस को छूता आया है ।

जन्माष्टमी उन्हींका जन्मदिन है जिनके जीवन में परात्पर ब्रह्म-परमात्मा का पूरा ओज चमकता हुआ दिखता है; उनको हम लोगों के बार-बार प्रणाम हैं । उनके नाम पर नाच लेने, जय बोलने या उनके आगे दीया-बत्ती करने से काम पूरा नहीं होता है, यह तो उसकी शुरुआत है । जब पूर्ण स्वरूप जो तुम्हारे हृदय में छुपा है उसको जानकर अपने जन्म-मृत्यु के बंधन को तोड़ दिया, समझ लो कि काम पूरा हो गया ।

- संत श्री आशारामजी बापू