कैसा हो भाइयों का आपसी प्रेम ?

वेद भगवान कहते हैं :

मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षत् । (अथर्ववेद3.30.3)

भाई, भाई से द्वेष न करे; भाई, भाई से न लड़े और न झगड़े ।

परिवार में सुख-शांति और आनंद के लिए जरूरी है भाइयों का आपसी प्रेम । आपस में द्वेष होने से सम्पत्ति कोर्ट-कचहरियों में भेंट चढ़ जाती है और घर-परिवार बरबाद हो जाते हैं जबकि आपसी निःस्वार्थ प्रेम से घर स्वर्ग बन जाते हैं । मेल-मिलाप से दरिद्रता के दिन भी सुखपूर्वक व्यतीत हो जाते हैं ।

भाइयों से प्रेम करो और प्रेम का आदर्श सीखो रामजी, लक्ष्मणजी और भरतजी से । जिस समय रामजी ने अपने राज्याभिषेक की बात सुनी तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ ।

रामजी कहते हैं : ‘‘हम सब भाई एक ही साथ जन्मे और बालकपन से ही भोजन, शयन, खेलकूद, कर्णवेध, यज्ञोपवीत और विवाह-संस्कार आदि भी साथ ही हुए परंतु हमारे निर्मल कुल में यह बड़ी अनुचित बात है कि छोटे भाइयों को छोड़कर राज्यतिलक बड़े को ही हो ।’’ (श्री रामचरितअयो.कां9.3,4)

कैसा है रामजी का भ्रातृप्रेम !

जब महाराज दशरथ का देहांत हो गया था तब रामजी के वनवास और महाराज की मृत्यु की बात को गुप्त रखकर भरतजी को अयोध्या बुलाया गया था । अयोध्या पहुँचने पर जब भरतजी को ज्ञात हुआ कि पिताजी चल बसे तो वे विलाप करते हुए बोले : ‘‘हे माता ! मैं समझा था कि पिताजी राम भैया को राज्य देकर स्वयं कोई यज्ञानुष्ठान करेंगे इसलिए मैं प्रसन्न हो वहाँ से चला था ।’’ भरतजी ने विलाप ही नहीं किया अपितु बड़े भाई को वापस लाने के लिए वे वन में गये । जब रामजी किसी भी प्रकार से लौटने के लिए तैयार नहीं हुए तो भरतजी श्रीरामजी की चरण-पादुकाएँ लेकर वापस आये और 14 वर्ष तक नंदिग्राम में वानप्रस्थों का जीवन व्यतीत करते रहे । भरतजी में बड़े भाई के प्रति कैसा स्नेह है !

अब रामजी के प्रेम को भी देखिये । वन को जाते समय रामजी कहते हैं : ‘‘हे अयोध्यावासियो ! आप लोगों में जैसी प्रीति, आदर और बहुमान मेरे प्रति है, मेरी प्रसन्नता के लिए आप भरत के प्रति भी वैसा ही आदर और मान रखना ।’’

लक्ष्मणजी का स्नेह तो जगत-प्रसिद्ध है । वे अपने समस्त सुखों को छोड़ रामजी के साथ वन को चल दिये । कबंध राक्षस ने रामजी और लक्ष्मणजी को पकड़ लिया तो लक्ष्मणजी ने कहा था : ‘‘हे भाई ! इस राक्षस को मेरा शरीर दे के अपनी रक्षा कर लीजिये फिर सीताजी को प्राप्त कर और अयोध्या के राज्य-सिंहासन पर आरूढ़ हो कभी-कभी मेरा स्मरण कर लिया करना ।’’

अब महाभारतकाल पर दृष्टि डालते हैं । जब पांडव वन में गये थे तब दुष्ट दुर्योधन उन्हें चिढ़ाने के लिए राजसी ठाठ-बाट से चला था परंतु मार्ग में ही चित्रसेन गंधर्व के द्वारा बंदी बना लिया गया । जब युधिष्ठिर को पता लगा तो उन्होंने भीम और अर्जुन को उसे छुड़ाने की आज्ञा दी । भीम बोले : ‘‘मैं... और उस पापी को छुड़ाऊँ जिसके कारण हम दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं ? जिसने द्रौपदी का अपमान किया, जो हमारे प्राणों का ग्राहक बना हुआ है ?’’

युधिष्ठिर : ‘‘हमारी आपस की लड़ाई में हम पाँच और वे सौ हैं परंतु जब दूसरों से लड़ाई हो तब हम 105 हैं ।’’

भ्रातृप्रेम का कैसा उच्च आदर्श है !

अतः परिवार में भाई-भाई, कुटुम्बीजन एक-दूसरे के प्रति वैमनस्य आदि न रखकर आपस में परस्परं भावयन्तु... सङ्गच्छध्वं सं वदध्वं... परस्पर मिलकर चलें, मिल के रहें और सहायक बनें तथा सबके हृदयों में स्थित अंतर्यामी चैतन्य परमात्म-सत्ता को देखें व उसीके नाते व्यवहार करें तो उनका प्रेम आदर्श प्रेम हो जायेगा, उनका व्यवहार परमात्मप्रीत्यर्थ हो जायेगा और हृदय में परमात्म प्रेम व आनंद छलकेगा ।