किसको कहते हैं ऊँची पढ़ाई और तुच्छ पढ़ाई ?

किसको कहते हैं ऊँची पढ़ाई और तुच्छ पढ़ाई ?

- पूज्य बापूजी

जिनके जीवन का कोई ऊँचा लक्ष्य नहीं है वे हलकी इच्छाओं में, हलके दिखावों में, हलके आकर्षणों में खप जाते हैं । जीवन का कोई ऊँचा ध्येय बना लेना चाहिए और ऊँचे-में-ऊँचा ध्येय तो यह है कि जीवनदाता का अनुभव करें । अनंत ब्रह्मांडों का जो आधार है उसका साक्षात्कार करना - यह ऊँचा लक्ष्य है ।

दुनिया में हर इज्जतवाले से ऊँची इज्जत होती है आत्मज्ञानी की, हर ऊँचे पद से ऊँचा पद होता है आत्मपद, हर ऊँचे ज्ञान से ऊँचा ज्ञान होता है आत्मज्ञान । सारे ज्ञान इसीसे पैदा होते हैं - चाहे सिविल सर्जन का ज्ञान हो, चाहे टेक्नोलॉजी का हो, साइकोलॉजी का हो या बायोलॉजी का हो - सभी आत्मा की सत्ता से होते हैं । चाहे अतल-वितल का ज्ञान हो, चाहे नरक का ज्ञान हो, सारे ज्ञान का मूल स्थान, उद्गम-स्थान आत्मा है । सारे विश्व का ही नहीं, सारे ब्रह्मांडों का ज्ञान आत्मा की सत्ता से ही होता है । ब्रह्माजी भी सृष्टि का संकल्प करते हैं न, वे भी सत्ता उसी आत्मा से लाते हैं । शिवजी संहार करते हैं, वे भी शक्ति आत्मा से लाते हैं । सारी शक्तियाँ जो हैं विश्वभर की, वे उसी विश्व-चैतन्य आत्मा से आती हैैं । उस चैतन्य आत्मा का ज्ञान सर्वोपरि है ।

जो आँख का विशेषज्ञ है वह मस्तिष्क का नहीं होता, जो हृदय का विशेषज्ञ है वह दूसरे अंगों का विशेषज्ञ नहीं बन पाता । एक-एक अंग के ज्ञान की निपुणता पाने में ही उनका समय खप जाता है । यह तो हुई केवल स्थूल शरीर के एक-एक अंग के विशेषज्ञ की बात लेकिन आत्मा तो पूरे शरीर का विशेषज्ञ है, स्वर्ग-नरक का विशेषज्ञ है और सारे विशेषज्ञों का भी आधार तो वह आत्मा ही है । ढेर सारे ज्ञान एक-एक करके पा भी लोगे तो भी एक दिन जीवन पूरा हो जायेगा और मृत्यु के एक ही झटके में सब छूट जायेगा लेकिन उस एक आत्मज्ञान को पा लिया तो सब कुछ मिल गया । एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाय ।

ऐसी उच्च शिक्षा पा लो

ऊँची पढ़ाई और तुच्छ पढ़ाई किसको कहते हैं, जरा समझ लें । तुच्छ पढ़ाई वह है जो तुच्छ शरीर को ‘मैं’ मानना सिखाये और तुच्छ वस्तुओं से सुखी होने की तरफ तुम्हारी इच्छाएँ, वासनाएँ बढ़ाये । एम.बी.ए. कर लो मतलब गंजे व्यक्ति को भी कंघी बेचने की शिक्षा पा लो; जो आदिवासी कपड़े नहीं पहनते हैं उनको भी कपड़े धोने का साबुन पकड़ा दो और पैसे निकलवाओ । यह तुच्छ शिक्षा है । संत कबीरजी कहते हैं :

कबीर आप ठगाइयेऔर न ठगिये कोय ।

आप ठगे सुख ऊपजैऔर ठगे दुःख होय ।।

महत्त्वहीन शिक्षा क्या है ? अनावश्यक डिग्रियाँ लेना, व्यर्थ चीजों को याद करना, व्यर्थ जानकारी एकत्र करना और किसीके क्षणिक प्रभाव में आ जाना, किसीका रूप-लावण्य देखकर आकर्षित हो जाना, उस पर लट्टू हो जाना - यह महत्त्वहीन शिक्षा है ।

तो उच्च शिक्षा क्या है ? उच्च शिक्षा है शुद्ध प्रेम, आनंद कैसे बढ़े उसका उपाय और उसकी तरफ की यात्रा व उत्साहमयी दृष्टि कैसे बढ़े इसका ज्ञान । कैसी भी परिस्थिति आये, हार के, उद्विग्न होकर भागाभागी न करें बल्कि परिस्थिति के सिर पर पैर रख के अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ते जायें, फिसलें नहीं । दुःख आये लेकिन हम दुःख से प्रभावित न हों, इसकी क्या कला है - यह उच्च शिक्षा बताती है । आत्मविश्वास और एकाग्रता कैसे पायें, यह सिखाना उच्च शिक्षा का उद्देश्य है ।

जगतराम एक अनपढ़-गँवार था । उसने हरिहर बाबा को कहा : ‘‘बाबा ! मैं तो अनपढ़-गँवार हूँ, मेरा कल्याण हो जायेगा क्या ?’’

बाबा : ‘‘अरे जगतराम ! बाहर की योग्यताओं से दुःख नहीं मिटते । ‘दुःखहारी प्रभु ! तुम मेरे हो । मैं पढ़ा-लिखा हूँ या नहीं लेकिन मैं तुम्हारा हूँ...’ - ऐसा सोचा कर । ‘मैं तुम्हारा हूँ, ॐ ॐ ॐ...’ - ऐसा भीतर चिंतन करो और शांत होते रहो । उस शांति से बुद्धि में भगवान का प्रसाद आयेगा ।’’

‘‘महाराज ! भगवान कैसे हैं मैं तो नहीं जानता, मुझको तो आप ही भगवान लगते हो ।’’

अब ‘महाराज ! ॐ ॐ ॐ...’ कहते हुए जगतराम मन-ही-मन अपने गुरु महाराज से बातें करता । धीरे-धीरे उसका मन शांत होने लगा और वह गुरुभाव में इतना एकाग्र हो गया कि जो होनेवाला हो वह पहले ही बोल देवे, जो मन में सोचे वह चीज-वस्तु-परिस्थिति आ जाय क्योंकि उच्च शिक्षा के मूल तक पहुँच गया ।

तो आपको अंदर का सुख-सामर्थ्य मिलेगा

उन्नति के लिए प्राण को महत्त्व दो और अवनति के लिए अपान को । हम जब ‘हरि ओऽऽऽऽऽऽऽम्’ बोलते हैं तो प्राण ऊपर आते हैं । मनुष्य का जीवन बुद्धि और कर्म का मिश्रण है । बुद्धि और कर्म के मिश्रण से अर्थात् जो इन्द्रियों से कर्म करके, बुद्धि से निर्णय करके सुखी होना चाहता है, पदवियाँ, पत्नी, पति, भोग, वाहवाही पाकर सुखी होना चाहता है उसको सुखद अवस्था तो मिलती है लेकिन उसके प्राण और मति प्रवृत्ति की तरफ, संसार की तरफ हैं और संसार फिर अपान में (नीचे के केन्द्रों में) ले जायेगा । लेकिन जो वासनापूर्ति करके सुखी होने की बेवकूफी छोड़नेवाला सत्संग समझ लेता है कि वासनापूर्ति का सुख पतन की तरफ ले जाता है और वासना-निवृत्ति का सुख परमात्मा में ले जाता है तो फिर वह अपनी इच्छा-वासना पूरी हो इस पचड़े में नहीं पड़ता, वह इच्छा निवृत्त हो इस सूझबूझ में लगता है । कोई बोले कि ‘भगवान को पाने की इच्छा भी नहीं करें ?’

भगवान को पाने की इच्छा सारी इच्छाएँ मिटाने का एक सबल साधन है । सारी इच्छाएँ मिट गयीं तो भगवान को पाने की इच्छा भी फिर अपने-आप शांत हो जाती है, भगवान ही अंतर में प्रकट हो जाते हैं । तो संकल्प की, इच्छा की निवृत्ति को महत्त्व देते हो तो आपको अंदर का सुख-सामर्थ्य मिलेगा और मरने का भय नहीं रहेगा, जीने की आशा नहीं रहेगी; जीते-जी आप परिस्थितियों के प्रभाव से मुक्त हो जायेंगे, जीवन्मुक्त हो जायेंगे ।