दो प्रकार के साधन

वेदों में मुख्य रूप से दो प्रकार के साधन बताये गये हैः विधेयात्मक और निषेधात्मक ।

       यजुर्वेद के ‘बृहदारण्यक उपनिषद्’ में आता हैः अहं ब्रह्मास्मि । अर्थात् ‘मैं ब्रह्म हूँ...’ तो जो ‘मैं-मैं’ बोलता है, वह वास्तव में ब्रह्म है । लेकिन देह को ‘मैं’ मानकर आप ब्रह्म नहीं होंगे । आपका जोर ‘देह’ पर है कि ‘चेतन’ पर ? ‘अहं’ पर जोर है कि ‘ब्रह्म’ पर?  अहं ब्रह्मास्मि । ‘मैं ब्रह्म हूँ... मैं साक्षी हूँ... ’ तो स्थूल ‘मैं’ पर जोर है कि शुद्ध ‘साक्षी’ पर ? यदि ‘मैं’ पर जोर है तो इससे अहंकार बढ़ने की संभावना है और ‘ब्रह्म’ पर जोर है तो अहंकार के विसर्जन की संभावना है। यह साधना है विधेयात्मक ।

       ‘बीमारी होती है तो शरीर को होती है । दुःख होता है तो मन को होता है । राग-द्वेष होता है तो बुद्धि को होता है । गरीबी-अमीरी सामाजिक व्यवस्था में होती है । मैं इन सबसे निराला हूँ । बीमारी के समय भी मैं बीमारी का साक्षी हूँ । दुःख के समय भी मन में दुःखाकार वृत्ति हुई उस वृत्ति का मैं साक्षी हूँ...’ इस प्रकार साक्षीस्वभाव... ‘ अहं ब्रह्मास्मि’ की भावनावाली साधना को बोलते हैं विधेयात्मक साधना । किन्तु इसमें अहंकार होने की संभावना है कि ‘मैं ब्रह्म हूँ... मैं चेतन हूँ... मैं साक्षी हूँ... ये लोग संसारी हैं । मैं अकर्त्ता हूँ, ये लोग कर्त्ता हैं ।’

दूसरी जो निषेधात्मक साधना है उसमें अहंकार के घुसने की जगह नहीं है । कैसे ?

निषेधात्मक साधना में साधक यह चिंतन करता हैः ‘मैं शरीर नहीं हूँ... चित्त नहीं हूँ...  अहंकार नहीं हूँ...’ इत्यादि । इस प्रकार ‘यह नहीं... यह नहीं... नेति... नेति...’ करते-करते फिर जो बाकी रहेगा उसमें वह शांत होता जायेगा ।

‘मैं आत्म-साक्षात्कार करके ही रहूँगा...’ इसमें अहंकार हो सकता है । ‘मुझे आत्म-साक्षात्कार नहीं करना है...’ यह भी अहंकार है, परंतु ‘मुझे तो तुझे पाना है... मुझे अपना अहं मिटाना है...’ तो मिटने में अहंकार को घुसने की जगह नहीं मिलती है । इसलिए यह बड़ा सुरक्षित मार्ग हो जाता है ।

इस तरह निषेधात्मक साधना भी विधेयात्मक साधना से ज्यादा सुरक्षित रूप से हमें परमात्मा की विश्रांति में पहुँचा देती है । लेकिन जो निराशावादी हैं उनके लिए निषेधात्मक साधना की अपेक्षा विधेयात्मक साधना ज्यादा लाभकारी है । इसीलिए वेदों में दोनों मार्ग बताये गये हैं ।