उत्सवों की लड़ी : दीपावली

पर्व क्यों मनाये जाते हैं ?

सारे जीव सच्चिदानंद परमात्मा के अविभाज्य अंग हैं । परमात्मा आनंदस्वरूप है, शाश्वत है, ज्ञानस्वरूप है तो ये सारे पर्व, उत्सव और कर्म हमारे ज्ञान, सुख और आनंद की वृद्धि के लिए तथा हमारी शाश्वतता की खबर देने के लिए ऋषि-मुनियों ने आयोजित किये हैं । सत्, चित् और आनंद से उत्पन्न हुआ यह जीव अपने सत्, चित् और आनंद स्वरूप को पा ले इसलिए पर्वों की व्यवस्था है ।

धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, नूतन वर्ष, भाईदूज - इन पर्वों का झुमका मतलब दीपावली पर्व । इसमें आतिशबाजी भी है, दीपोत्सव भी है, मिष्टान्न खाना-खिलाना भी है, नये वस्त्र, नयी वस्तु लाना-देना भी उचित है ।

धनतेरस

कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को धन्वंतरि महाराज का प्राकट्य दिवस है । यह पर्व धन्वंतरिजी द्वारा प्रणीत आरोग्य के सिद्धांतों को अपने जीवन में अपनाकर सदैव स्वस्थ एवं प्रसन्न रहने का संकेत देता है ।

‘पद्म पुराण’ में लिखा है कि ‘धनतेरस को दीपदान करनेवाले की अकाल मृत्यु टल जाती है ।’

नरक चतुर्दशी के दिन क्या करें ?

कार्तिक के महीने में तैलाभ्यंग करना वर्जित है लेकिन नरक चतुर्दशी को तिल के तेल से मालिश करके स्नान करने का बड़ा भारी महत्त्व है । पहले शौच जायें, फिर मालिश करके स्नान करें । इस दिन सूर्योदय के बाद जो स्नान करता है उसके पुण्यों का क्षय माना गया है । हो सके तो जौ, तिल और आँवले का चूर्ण मिला के बनाया उबटन या सप्तधान्य उबटन अथवा तो देशी गाय के गोबर को शरीर पर रगड़ के स्नान करें ।

नरक चतुर्दशी का संदेश

भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर को क्रूर कर्म करने से रोका और उसे यमपुरी पहुँचाया । नरकासुर प्रतीक है वासनाओं के समूह एवं

अहंकार का । आप भी अपने चित्त में विद्यमान नरकासुररूपी अहंकार एवं वासनाओं के समूह को परमात्मा के चरणों में समर्पित कर दो ताकि आपका अहं यमपुरी पहुँच जाय और आपकी असंख्य वृत्तियाँ परमेश्वर से एकाकार हो जायें । सोऽहम्... शिवोऽहम्... आनंदोऽहम्, चैतन्योऽहम्, शांतोऽहम्, सर्वरूपोऽहम्... ।

दीपावली

प्राचीन सत्साहित्यों से पता चलता है कि भगवान श्रीराम के पूर्व भी दीपावली का पर्व मनाया जाता था ।

वर्ष में चार महारात्रियाँ होती हैं :

(1) महाशिवरात्रि

(2) होली

(3) जन्माष्टमी

(4) दीपावली

ग्रह-नक्षत्रों का प्रभाव इन चार महारात्रियों में विशेष होता है । अतः दिवाली की रात में महालक्ष्मी और सुख-सम्पदा के साथ ब्रह्मविद्या को पाने के लिए जप-ध्यान, ईश्वर-प्रीति, स्मृति का विशेष महत्त्व है ।

लक्ष्मीप्राप्ति मंत्र

जो धन चाहते हैं उनके लिए लक्ष्मीप्राप्ति का मंत्र जपना लाभकारी होता है । मंत्र -

ॐ नमो भाग्यलक्ष्म्यै च विद्महे ।

अष्टलक्ष्म्यै च धीमहि । तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ।

लक्ष्मी माता की स्थायी

प्रसन्नता कैसे पायें ?

एक धन होता है ‘वित्त’ । वित्त-सम्पदा तो बहुत होती है लाखों-करोड़ों-अरबों रुपयों की । वित्त तो सँभाल-सँभाल के कई मर गये । दूसरी होती है ‘लक्ष्मी’ । भगवत्सुमिरन-चिंतन से, धर्म-कर्म का खयाल करते हुए जो कमाई होती है वह लक्ष्मी होती है । यहाँ भी और परलोक में भी वह सुख देगी । तीसरी होती है ‘महालक्ष्मी’ । महालक्ष्मी भोग तो देती है साथ ही मोक्षस्वरूप परमात्मा से भी मिलाने के काम आती है और प्रेरणा देती है । तो हिन्दू संस्कृति ने वित्त की अपेक्षा लक्ष्मी और लक्ष्मी से भी महालक्ष्मी का विशेष आदर किया । क्योंकि भारतीय संस्कृति का उद्देश्य केवल भोग नहीं, केवल बाहर की सुविधा नहीं, अंतरात्मा की शांति, तृप्ति और विश्रांति है । यह स्थिति नहीं प्राप्त हुई तो सोने की लंकावाला रावण व सोने के हिरण्यपुरवाला हिरण्यकशिपु

भी संसार से हारकर चले गये । शबरी भीलन, रैदासजी, कबीरजी, तुकारामजी और राजा जनक - ऐसे आत्मतृप्तिवाले जीत जाते हैं । उनकी बुद्धि से अविद्या, अज्ञान मिट जाता है । आत्मसुख और आत्मज्ञान से उनकी जगजीत प्रज्ञा हो जाती है । पूरे जगत को जीत लिया उन्होंने, जिन्हें जगजीत प्रज्ञा प्राप्त हो गयी है ।

यदि आपकी समझ बढ़े, आप हलके स्वभाव पर विजय पाओ तो लक्ष्मी को बुलाना नहीं पड़ेगा, लक्ष्मी तो आपके घर में निवास करेगी । जहाँ नारायण हैं वहाँ पतिव्रता लक्ष्मीजी हैं । जहाँ नारायण की भक्ति है, नारायण का वास है, वहाँ लक्ष्मीजी को क्या अलग से बुलाना पड़ता है ? नहीं, वहाँ तो वे अपने आप आती हैं ।

अतः इस दिन माता लक्ष्मी से यह प्रार्थना करना कि ‘माँ ! जैसे तुम्हें नारायण प्रिय हैं, वैसे हमें भी वे नारायण प्यारे लगें ।’ इस प्रकार से प्रार्थना कर माँ से बाह्य वैभव न चाहकर आत्मवैभव चाहोगे तो मुझे लगता है कि लक्ष्मी माता भी प्रसन्न होंगी और नारायण भी प्रसन्न होंगे और आप भी प्रसन्न होंगे ।

दिवाली का आध्यात्मिकीकरण

दिवाली में चार काम करते हैं - पहला काम घर साफ-सूफ करते हैं, ऐसे अपना साफ इरादा कर दो कि हमको इसी जन्म में परमात्म-सुख, परमात्म-ज्ञान पाना है ।

दूसरा काम नयी चीज लाना । जैसे घरों में चाँदी, कपड़े या बर्तन आदि खरीदे जाते हैं, ऐसे ही अपने चित्त में उस परमात्मा को पाने के लिए कोई दिव्य, पवित्र, आत्मसाक्षात्कार में सीधा साथ दे ऐसा जप, ध्यान, शास्त्र-पठन आदि का नया व्रत-नियम ले लेना चाहिए ।

तीसरा काम है दीये जलाना । बाह्य दीयों के साथ आप ज्ञान का दीया जलाओ । हृदय में है तो आत्मा है और सर्वत्र है तो परमात्मा है । वह परमात्मा दूर नहीं, दुर्लभ नहीं, परे नहीं, पराया नहीं, सबका अपना-आपा है । ज्ञान के नजरिये से अपने ज्ञानस्वरूप में जगो । व्यर्थ का खर्च न करो, व्यर्थ का बोलो नहीं, व्यर्थ का सोओ नहीं, ज्यादा जागो नहीं, युक्ताहारविहारस्य... ज्ञान का दीप जलाओ ।

चौथी बात है मिठाई खाना और खिलाना । आप प्रसन्न रहिये । सुबह गहरा श्वास लेकर सवा मिनट रोकिये और ‘मैं आनंदस्वरूप ईश्वर का हूँ और ईश्वर मेरे हैं ।’ - यह चिंतन करके दुःख, अशांति और नकारात्मक विचारों को फूँक मार के बाहर फेंक दो । ऐसा दस बार करो तो आप मीठे रहेंगे, अंतरात्मदेव के ध्यान की, वैदिक चिंतन की मिठाई खायेंगे और आपके सम्पर्क में आनेवाले भी मधुर हो जायेंगे, उन्हें भी प्रेमाभक्ति का रस मिलेगा ।

दीपावली संदेश

दीपावली के दिन आप अपने घर तो दीया जलाओ लेकिन आस-पड़ोसवाले गरीब का भी ध्यान रखो, वहाँ भी 4 दीये जलाकर आओ ।

बच्चों को कपड़े बाँटकर आओ, मिठाई दे आओ । छोटे-से-छोटे व्यक्ति को स्नेह से मिलो और अपना बड़प्पन भूलो । जैसे आम के वृक्ष में फल लगते हैं तो झुकता है और बबूल का वृक्ष फलित होता है तो भी काँटों से लदा रहता है, ऐसे ही जिसके जीवन में धर्म है, संस्कार हैं, उसके जीवन में नम्रता, सरलता, सहनशक्ति, उदारता आदि सद्गुण आते हैं और जो अधर्म एवं कुसंस्कारों के आश्रित है, अहं की अकड़ से दूसरों को परेशान करता है व खुद भी होता है उसका जीवन दुर्गुणरूपी काँटों से लद जाता है ।

कैसे करें नूतन वर्ष का स्वागत ?

दीपावली के दूसरे दिन को वर्ष का प्रथम दिन मानते हैं । इस दिन जो मनुष्य हर्ष में रहता है, उसका पूरा वर्ष हर्ष में जाता है और जो शोक में रहता है, उसका पूरा वर्ष शोक में व्यतीत होता है ।

दीपावली और नूतन वर्ष के दिन संत-महापुरुषों व मंगलमय चीजों का दर्शन करना शुभ माना गया है, पुण्य-प्रदायक माना गया है । जैसे - सूर्यदेव, देव-प्रतिमा, गौ, अग्नि, गुरु, हंस, मोर, नीलकंठ, बछड़े सहित गाय, पीपल वृक्ष, दीपक, सुवर्ण, तुलसी, घी, दही, शहद, पानी से भरा घड़ा, कपूर, चाँदी, कुश, गोमूत्र, गोबर, गोदुग्ध, गोधूलि, गौशाला, दूर्वा, चावल और अक्षत आदि का दर्शन ‘ब्रह्मवैवर्त पुराण’ में शुभ माना गया है ।

(ब्र.पु. श्रीकृष्णजन्म खंड, अध्याय : 76)

नूतन वर्ष के दिन सुबह जगते ही बिस्तर पर बैठे-बैठे चिंतन करना कि ‘आनंदस्वरूप परमात्मा मेरा आत्मा है । प्रभु मेरे सुहृद हैं, सखा हैं, परम हितैषी हैं, ॐ ॐ आनंद ॐ... ॐ ॐ माधुर्य ॐ...Ÿ। वर्ष शुरू हुआ और देखते-देखते आयुष्य का एक साल बीत जायेगा फिर दीपावली आयेगी । आयुष्य क्षीण हो रहा है । आयुष्य क्षीण हो जाय उसके पहले मेरा अज्ञान क्षीण हो जाय । हे ज्ञानदाता प्रभु ! मेरा दुःख नष्ट हो जाय, मेरी चिंताएँ चूर हो जायें । हे चैतन्यस्वरूप प्रभु ! संसार की आसक्ति से दुःख, चिंता और अज्ञान बढ़ता है और तेरी प्रीति से सुख, शांति और माधुर्य का निखार होता है । प्रभु ! तुम कैसे हो तुम्हीं जानो, हम जैसे-तैसे हैं तुम्हारे हैं देव ! ॐ ॐ ॐ...’

फिर बिस्तर पर तनिक शांत बैठे रहकर अपनी दोनों हथेलियों को देखना -

कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती ।

करमूले तु गोविंदः प्रभाते करदर्शनम् ।।

अपने मुँह पर हाथ घुमा लेना । फिर दायाँ नथुना चलता हो तो दायाँ पैर और बायाँ चलता हो तो बायाँ पैर धरती पर पहले रखना ।

इस दिन विचारना कि ‘जिन विचारों और कर्मों को करने से हम मनुष्यता की महानता से नीचे आते हैं उनमें कितना समय बरबाद हुआ ? अब नहीं करेंगे अथवा कम समय देंगे और जिनसे मनुष्य-जीवन का फायदा होता है - सत्संग है, भगवन्नाम सुमिरन है, सुख और दुःख में समता है, साक्षीभाव है... इनमें हम ज्यादा समय देंगे, आत्मज्योति में जियेंगे । रोज सुबह नींद में से उठकर 5 मिनट शिवनेत्र पर ॐकार या ज्योति अथवा भगवान की भावना करेंगे...।’

भाईदूज

यह पर्वपुंज का पाँचवाँ दिन है । इस दिन बहन भाई को इस भावना से तिलक करती है कि मेरा भाई त्रिलोचन रहे । (उसका सद्विवेकरूपी तीसरा नेत्र जागृत हो ।)

इस दिन भाई अपनी बहन के यहाँ भोजन करे और बहन उसके ललाट पर तिलक करे तो वह त्रिलोचन, बुद्धिमान होता है और यमपाश में नहीं बँधता । यह भाईदूज हमारे मन को भी उन्नत रखती है और परस्पर संकल्प देकर सुरक्षित भी करती है ।