माँ महँगीबाजी का आज्ञापालन और ब्रह्मनिष्ठा

(ब्रह्मलीन मातुश्री श्री माँ महँगीबाजी का महानिर्वाण दिवस)

हमारी संस्कृति में संसारी रिश्तों (शरीर के नाते-संबंधों) से बढ़कर आत्मिक रिश्तों (परमात्मा के नाते माने गये संबंधों) का आदर है, ज्ञान का आदर है । यही हमारी संस्कृति की महानता है ।

हमारे देश में ऐसे भी सौभाग्यशाली मनीषी हुए हैं जिन्होंने अपने रिश्तेदारों में किसीको ब्रह्मवेत्ता पाया तो शरीर के रिश्ते को किनारे रखते हुए उन महापुरुष का शिष्यत्व प्राप्त कर आत्मा का ज्ञान पाया । संत ज्ञानेश्वरजी ने अपने बड़े भाई योगी निवृत्तिनाथजी को गुरु मानकर पूर्णता की अनुभूति की थी । श्वेतकेतु ने अपने पिता उद्दालक ऋषि से ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य के उपदेश से ब्रह्मज्ञान पाया । इसमें भी ज्ञान के आदर की पराकाष्ठा तब देखने को मिलती है जब एक माँ अपने उन ब्रह्मवेत्ता पुत्र को, जिनका उसने बाल्यकाल में अपने हाथों लालन-पालन किया था, सद्गुरुरूप में स्वीकार कर ब्रह्मविद्या से पूर्णता को पा लेती है । इसका उदाहरण हैं माता देवहूति, जिन्होंने अपने पुत्र कपिल मुनि से ब्रह्मविद्या पायी । और ऐसी माताओं में पराकाष्ठा की भी पराकाष्ठा तब प्रकट हो जाती है जब कोई माँ, जो अपने पुत्र के बाल्यकाल में उसकी भक्तिमार्ग की गुरु भी हो, वही माँ पुत्र के ब्रह्मवेत्ता हो जाने पर ब्रह्मविद्या एवं अपने मनुष्य-जन्म का परम आदर करते हुए अपने ही पुत्र की शिष्या हो के अपनी अंतिम साँस तक उनके हर एक शब्द को गुरुआज्ञा के रूप में सिर-आँखों पर रख ब्रह्मज्ञान को उपलब्ध हो जाती है । जानते हैं ऐसी माँ कौन थीं ? ऐसी माँ थीं पूज्य बापूजी की मातुश्री ब्रह्मलीन श्री माँ महँगीबाजी ! विश्व-इतिहास में ऐसी दूसरी माँ हमारे देखने-सुनने में नहीं आयीं ।  

माँ महँगीबाजी का जीवन ईश्वरप्राप्ति के पथ पर चलनेवाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक ऐसा आदर्श चरित्र है जिसका अनुगमन कर वह आसानी से पूर्ण गुरुकृपा का अधिकारी बन सकता है । एक बार जेठानंदजी (अम्माजी के बड़े पुत्र) अम्माजी को कुछ दिनों के लिए अपने घर ले जाने के लिए आये । पहले तो अम्माजी ने साफ मना कर दिया क्योंकि बापूजी से दूर जाना अम्माजी को बिल्कुल पसंद नहीं था और आश्रम के जप-ध्यान के अनुकूल सात्त्विक, साधना-सेवामय वातावरण में अम्माजी का जीवन ढल चुका था । मगर जेठानंदजी अम्माजी को बहुत आग्रह करने लगे कि ‘‘आप तो हम दोनों की माँ हैं, आपके लिए हम दोनों एक समान हैं तो फिर मेरे घर रहने क्यों नहीं आतीं ?’’

अम्माजी बापूजी से पूछे बिना कभी कोई भी फैसला नहीं लेती थीं । अतः जेठानंदजी को उत्तर देने से पहले अम्माजी पूज्यश्री के पास जाकर बोलीं : ‘‘साँईं ! जेठानंद मुझे अपने घर कुछ दिनों के लिए ले जाना चाहता है ।’’

बापूजी ने पूछा : ‘‘क्या आप जाना चाहती हैं ?’’

अम्माजी : ‘‘वैसे तो मैं बिल्कुल नहीं जाना चाहती लेकिन दुनियादारी के हिसाब से जाना उचित रहेगा ।’’

संसारी मोह में फिसलते उनके मन को देखकर बापूजी ने कहा : ‘‘अम्मा ! क्या रखा है इस मोह-ममता में ? आप तो ईश्वर में मन लगाओ ।’’

कुछ रुककर गुरुदेव बोले : ‘‘देखो ! मेरे पास रहोगी, साधना में रत रहोगी तो जिम्मेदारी मेरी रहेगी ।’’

निर्मल एवं सूक्ष्म आध्यात्मिक मतिसम्पन्न अम्माजी ‘जिम्मेदारी’ शब्द से बापूजी के वचनों का इशारा तुरंत ही समझ गयीं और उन्होंने उसी समय जेठानंदजी को मना कर दिया । मोह का रिश्ता, जो स्वयं व अपने नाते-रिश्तेदारों को भी सच्चे सुख से विमुख कर मोह में फँसा देता है, उसे आदर्श साधिका अम्माजी ने ईश्वरप्राप्ति के लक्ष्य के आगे गौण कर दिया और परम हितकारी, सर्वमांगल्यकारी ईश्वरीय रिश्ते को सर्वाधिक महत्त्व दिया, शिरोधार्य किया और उसके बाद जीवनभर कभी गुरुद्वार छोड़ने का सोचा तक नहीं । (इसका फल उन्हें क्या मिला, पढ़ें इस लेख के अंत में)

कितनी पराकाष्ठा का आज्ञापालन था अम्माजी का ! परमात्मप्राप्ति के प्रति दृढ़ लक्ष्यनिष्ठ अम्माजी ने ‘अग्या सम न सुसाहिब सेवा’ इस शास्त्र-वचन को अपने जीवन में पूर्ण चरितार्थ कर दिखाया । इसीका सुपरिणाम था कि अम्माजी के जीवन में ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ इस परमोच्च वेदांत-ज्ञान के प्रति निष्ठा के फूल खिले ।

‘जगत है ही नहीं...’

पूज्य बापूजी अम्माजी को याद करते हुए उनका एक संस्मरण बताते हैं :

एक बार मैंने पूछा : ‘‘अम्मा ! क्या हाल है ?’’

अम्मा : ‘‘हाल क्या ! जगत है ही नहीं, जगत बना ही नहीं, यह सब सपना है ।’’

‘‘यह कैसे ? तुम्हारा बड़ा बेटा पैदा हुआ, उसके बच्चे हुए, वह अस्वस्थ हुआ, उसने शरीर छोड़ा... फिर जगत क्यों नहीं है ? बड़ी ब्रह्मज्ञान की बात करती हो !’’

‘‘जैसे हुआ वैसे ‘नहीं हुआ’ हो गया । अब तो केवल बोलते हैं, अभी है तो नहीं । कहाँ आया, कहाँ जिया, कहाँ समाप्त हो गया, सब ऐसे ही तो है ! केवल एक आत्मा है, जगत है ही नहीं ।’’

मैंने कहा, ‘वाह !’

ऐसा नहीं कि केवल शब्द हों, नहीं, दबंग होकर बोलती थीं । जो उपदेश मुझे देना चाहिए वह मेरी माँ मुझे सुना रही हैं । पीड़ा होती तो बोलतीं : ‘‘यह तो शरीर को होती है । मैं तो मुक्तात्मा हूँ, ब्रह्म हूँ । जगत है ही नहीं । ॐ... ॐ... आनंद... आनंद...’’ अम्मा का व्यवहार देख के मुझे बहुत प्रसन्नता होती थी ।

एक बार मैंने कहा : ‘‘अम्मा ! चलो मोटेरा । वहाँ सब माइयाँ याद करती होंगी तुमको ।’’

‘‘मुझे नहीं, शरीर को याद करेंगी । उधर रहती हूँ तो सारा दिन ‘अम्मा ! ऐसा हुआ, अम्मा ! ऐसा हुआ...’ करती रहती हैं । मेरे शरीर के आगे ‘अम्मा ! अम्मा !...’ करती रहती हैं । अरे, क्या अम्मा ! अम्मा !... जगत है ही नहीं ।’’

हमको तो सुनकर बहुत अच्छा लगा ।

...ऐसी कभी फरियाद नहीं की

पूज्य बापूजी यह भी बताते हैं कि ‘‘जब मैं घर छोड़कर चला गया था तो मेरी माँ ने ऐसा नहीं कहा कि ‘हाय-रे-हाय ! जीवनभर जिसके लिए इतना सब कुछ किया, उस बेटे ने मुझे सुख नहीं दिया... मेरा क्या होगा !’ ऐसी कभी फरियाद नहीं की । हाँ, एक बात कहती थीं कि ‘मेरा बेटा क्या खाता होगा ? नाश्ता उसको मिलता होगा कि नहीं ?’ ऐसा चिंतन करके कभी-कभार थोड़ा-सा दुःखाभास होता था । हम जब गुरुकृपा पाकर 7 वर्ष की साधना के बाद गुरुआज्ञा से घर आये तो उनका रुख फरियाद का नहीं था ।

जो मंजिल चलते हैं वे शिकवा नहीं किया करते ।

जो शिकवा किया करते हैं वे मंजिल नहीं पहुँचा करते ।।

तब से माँ का मेरे प्रति आदरभाव हो गया । वे मुझे पुत्र के रूप में नहीं देखती थीं वरन् जैसे कपिल मुनि की माँ उनको भगवान के रूप में, गुरु के रूप में मानती थीं, वैसे ही मेरी माँ मुझे मानती थीं ।

अम्माजी ने अमरता को पा लिया

जब शरीर छोड़ने का समय आया तो आखिरी 3 दिन अम्मा ने न तो अन्न-जल लिया, न किसीसे मेलजोल, न कोई बातचीत की । सबसे उपराम होकर केवल भगवान के चिंतन, भगवान की गहराई में डूबी रहीं ।’’

जब अम्माजी का शरीर छोड़ने का समय आया तब उन्होंने पूज्यश्री को उस बात का स्मरण दिलाया कि ‘‘साँईं ! आपने कहा था कि ‘मेरे पास रहोगी, साधना में रत रहोगी तो आपकी जिम्मेदारी मेरी ।’ देखा, उसके बाद मैं कभी नहीं गयी, जेठा ही मुझसे मिलने आता था ।’’ अम्माजी के ये वचन सुनकर बापूजी ने करुणार्द्र हो प्रसन्नताभरी मंद मुस्कान के साथ हामी भरी । अम्माजी ‘गुरुआज्ञापालन योग’, ‘गुरु-वचन पालन योग’ द्वारा ‘गुरुभक्तियोग’, ‘गुरुकृपायोग’ के पूर्ण फल को पाकर कृतकृत्य, आत्मनिष्ठ हो गयीं ।

पूज्यश्री : ‘‘और माँ ने अंत में शरीर का त्याग करके अपनी अमरता को पाया । माँ ने दिल्ली के एकांत आश्रम में सुबह के समय शरीर छोड़ा ।’’

अम्माजी गुरुआज्ञा-पालन में तत्पर रहीं और बाहरी बड़प्पन से बचीं तो ऐसी ऊँचाई पर पहुँच गयीं जो बड़े-बड़े योगियों को भी दुर्लभ है ! उनका पावन, पुण्यमय स्मरण करके हम भी धनभागी हो रहे हैं ।