जिस प्रकार अधिकांश वैदिक मंत्रों के आरम्भ में  लगाना आवश्यक माना गया है, वेदपाठ के आरम्भ में हरि ॐ का उच्चारण अनिवार्य माना जाता है, उसी प्रकार प्रत्येक शुभ अवसर पर श्री गणपतिजी का पूजन अनिवार्य है । उपनयन, विवाह आदि सम्पूर्ण मांगलिक कार्यों के आरम्भ में जो श्री गणपतिजी का पूजन  करता है, उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है ।

            गणेश चतुर्थी के दिन गणेश उपासना का विशेष महत्त्व है । इस दिन गणेशजी की प्रसन्नता के लिए इस ‘गणेश गायत्रीमंत्र का जप करना चाहिए :

महाकर्णाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ।

            श्रीगणेशजी का अन्य मंत्र, जो समस्त कामनापूर्ति करनेवाला एवं सर्व सिद्धिप्रद है :

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गणेश्वराय ब्रह्मस्वरूपाय चारवे ।

सर्वसिद्धिप्रदेशाय विघ्नेशाय नमो नमः ।।

(ब्रह्मवैवर्त पुराणगणपति खंड : 13.34)

            गणेशजी बुद्धि के देवता हैं । विद्यार्थियों को प्रतिदिन अपना अध्ययन-कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व भगवान गणपति, माँ सरस्वती एवं सद्गुरुदेव का स्मरण करना चाहिए । इससे बुद्धि शुद्ध और निर्मल होती है ।



विघ्न निवारण हेतु



            गणेश चतुर्थी के दिन ॐ गं गणपतये नमः  का जप करने और गुड़मिश्रित जल से गणेशजी को स्नान कराने एवं दूर्वा व सिंदूर की आहुति देने से विघ्नों का निवारण होता है तथा मेधाशक्ति बढ़ती है ।



भूलकर भी न करें...



            गणेश चतुर्थी के दिन चाँद का दर्शन करने से कलंक लगता है । 


            भूल से चन्द्रमा दिख जाने पर श्रीमद् भागवत’ के 10वें स्कंध के 56-57वें अध्याय में दी गयी स्यमंतक मणि की चोरीकी कथा का आदरपूर्वक पठन-श्रवण करना चाहिए । भाद्रपद शुक्ल तृतीया या पंचमी के चन्द्रमा का दर्शन करना चाहिए, इससे चौथ को दर्शन हो गये हों तो उसका ज्यादा दुष्प्रभाव नहीं होगा ।



            निम्न मंत्र का 21, 54 या 108 बार जप करके पवित्र किया हुआ जल पीने से कलंक का प्रभाव कम होता है । मंत्र इस प्रकार है :



सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः ।

सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः ।।



            ‘सुंदर, सलोने कुमार ! इस मणि के लिए सिंह ने प्रसेन को मारा है और जाम्बवान ने उस सिंह का संहार किया है, अतः तुम रोओ मत । अब इस स्यमंतक मणि पर तुम्हारा ही अधिकार है ।’

(ब्रह्मवैवर्त पुराणअध्याय : 78)