एक बार स्वामी मुक्तानंदजी से उनकी एक शिष्या ने पूछा : ‘‘गुरुदेव ! एक बार आपने कहा था कि ‘गुरु का ऋण चुकाया नहीं जा सकता ।’ क्या ऋण चुकाने का कोई भी उपाय नहीं है ?’’

                मुक्तानंदजी : ‘‘जिन गुरु ने अपनी आंतरिक शक्ति देकर शिष्य का अंतर बदल दिया, बदल के अपने जैसा कर दिया फिर उस शिष्य के पास उसका है ही क्या जो दे के गुरु का ऋण चुका सके ? थोड़ी-सी जमीन, हजार-दो हजार रुपये अथवा दो-चार मीटर कपड़ा देकर चुकावे, कैसे चुकावे ? संत ज्ञानेश्वर महाराज इस विषय में कहते हैं कि ‘‘कुछ भी देकर गुरु का ऋण चुकता नहीं । इसलिए मैं अपने को ही, अपनेपन को ही पूरा दे देता हूँ । ‘मैं’ को ही दे देने से फिर कुछ चुकाने की बात ही खत्म हो जाय । ‘मैं’पना मिट जाय तो फिर चुकाना भी मिट जाय ।’’

असली धन और सच्ची दृष्टि

                दूसरी शिष्या ने एक प्रश्न पूछा : ‘‘बाबाजी ! जब मैं आश्रम में इतनी समृद्धि देखती हूँ तो अपने संस्कारों के कारण कभी-कभी मेरा मन क्षुब्ध हो जाता है क्योंकि मुझे मालूम है कि देश में कितनी गरीबी है । कृपा करके मेरा संशय दूर कीजिये ।’’

                मुक्तानंदजी : ‘‘यह तो तुम्हारे चित्त की दरिद्रता है । क्या भिखारीपन देखकर तुम्हारा चित्त खुश होता है ? मनुष्य को सविवेकी (विवेकसम्पन्न) होना चाहिए । मेरे मत से किसी भी आश्रम को परिपूर्ण होना चाहिए, आश्रम में कोई अभाव नहीं होना चाहिए । भिखारी वृत्ति का मनुष्य आश्रम में खराबी ही देखेगा, मध्यम वृत्ति का साधारण देखेगा और सम्पद् दृष्टि के मनुष्य को सब ठीक दिखेगा ।

                जिन्होंने बहुत जन्मों में बहुत दरिद्रता देखी उन्हें सम्पन्नता देखने में कष्ट भी होता होगा, जैसे अमीर को गरीबी देखने में कष्ट होता है । भिखारीपन परमात्मप्राप्ति का उपाय है क्या ? तुम्हारे पुराने संस्कार ही तुम्हें पीड़ा देते हैं । विवेकी के लिए केवल बाह्य सम्पद् भी भिखारीपना ही है । मैं कभी-कभी बिरला को भी भिखारी बोल देता हूँ । आत्मतृप्ति के बिना वह भी भिखारी ही है । तू इस सोना-चाँदी को सम्पद् समझती है या आत्मधन को ? आश्रम में क्या सम्पद् है - पेड़-पौधे, बिल्डिंग, हाथी या तुम लोग ?

                मेरे मन में भी बड़ा संशय होता है कि आश्रम में तुम हाथी-घोड़े को सम्पद् समझती हो या जो तुमने पाया है, जिसके लिए तुम यहाँ रह रही हो, सब चैन-आराम भूलकर यहाँ रात-दिन काम (सेवा, साधना आदि) करती हो उसको सम्पद् समझती हो ? मेरे लिए तो आत्मतृप्तियुक्त मानव ही श्रीमंत है ।’’

                उस शिष्या को सही दृष्टि प्राप्त हुई एवं उसके निमित्त से अनेक तत्सम वृत्तिवालों को अपना नजरिया निर्मल, विशुद्ध बनाने का सुअवसर प्राप्त हुआ ।