स्वामी अखंडानंदजी सरस्वती ने अपनी माता की आध्यात्मिक यात्रा के प्रारम्भिक सोपान से पराकाष्ठा तक का सुंदर वर्णन किया है, जो बड़ा ही प्रेरणादायी है ।

वे लिखते हैं: मेरी माँ का नाम था भागीरथी । मैं उन्हें ‘माँ’, ‘मैया’ आदि कहता था । मेरी 7 वर्ष की उम्र में ही मेरे पिताजी का भौतिक जीवन समाप्त हो गया था । अंतिम समय में उनके सिर से एक मांस-पिंड छलककर गंगाजी में गिर पड़ा था (ब्रह्मरंध्र से प्राण निकल गये थे) ।


जब मेरी माँ रामचरितमानस का पाठ करतीं तो उनकी आँखों से झर-झर आँसू गिरते । 
मेरी माँ मुझे बड़े प्रेम से भक्तों के चरित्र सुनाया करती थीं । तीर्थों से लौटने के बाद उनका मन पूजा-पाठ में बहुत लग गया । 11 वर्ष की उम्र में मैं गाँव छोड़कर पढ़ने के लिए काशी चला गया । माताजी को संसार के कार्यों में विशेष रुचि नहीं थी पर वे अपने वृद्ध ससुर की आज्ञा एवं सेवा का सम्पू्र्ण ध्यान रखती थीं, आये-गये लोगों को सँभालती थीं ।

पितामह की ऐसी शिक्षा थी कि घर के लोग अपने भोजन में उतना सुख नहीं मानते थे जितना दूसरों को भोजन कराने में और (कम पड़े तो) स्वयं भूखा रह जाने में भी सुख मानते थे । आनेवालों को खाटें दे दी जाती थीं और घर के लोग जमीन पर सोते थे ।

जब मैं स्वामी योगानंदजी पुरी के पास जाने लगा तब माताजी भी उनके पास आने लगीं । स्वामी योगानंदजी महाराज मंत्रजप, भगवत्पूजा, गुरुभक्ति पर बहुत बल देते थे । गंगा-स्नान के अनंतर वे घंटोंभर अपने गुरु की पूजा करते थे । वे कहते थे कि जब मैं सद्गुरुदेव की पूजा करता हूँ तो बार-बार उनके श्रीविग्रह में ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश, शक्ति, राम, कृष्ण प्रकट होते हैं और उनमें समा जाते हैं । उनकी गुरुभक्ति देखकर लोग आश्चर्यचकित हो जाते थे । उनका वेदांत-शास्त्र का पांडित्य एवं अनुभव भी परिपूर्ण था । मेरी माँ के जीवन पर योगानंदजी का भी पूरा प्रभाव पड़ा और उनके जीवन में भक्तिरस का उदय हुआ । वे घंटों तक भक्तिभाव में मग्न होने लगीं ।

माँ को मैं अध्यात्म रामायण, विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत का अर्थ सुनाया करता था । वे गद्गद हुआ करती थीं ।
जीवन में वेदांत का प्रवेश मेरे संन्यास लेने के बाद माताजी अद्वैत वेदांत का विचार करने लगीं । वे खूब सत्संग-श्रवण करतीं । भगवान की भक्ति तो थी ही, मेरे संन्यासी हो जाने पर उनके मन में विशेष वैराग्य का उदय हुआ और घर के काम में रुचि लेना कम हो गया ।


जब वे घर छोड़ के काशी में आयी थीं, उसके बाद उन्होंने घर-परिवार की चर्चा छोड़ दी थी । घर से आने के बाद उन्होंने कोई तीर्थयात्रा नहीं की । गंगा-यमुना आदि नदियों में स्नान की श्रद्धा एवं रुचि नहीं थी, मंदिर-मूर्ति से भी कोई लगाव नहीं था । कोई राजनीति अथवा जगत संबंधी चर्चा करे तो मना कर देती थीं या स्वयं कुछ (ज्ञान आदि की बात) कहने लगती थीं । शृंगार रस की चर्चा उन्हें सर्वथा नहीं भाती थी । गीता पढ़ती थीं, रामायण, भागवत सुनती थीं । कोई भी पास आकर बैठ जाय तो उससे वेदांत-संबंधी बात करती थीं ।

श्री उड़िया बाबाजी और श्री हरि बाबाजी के सत्संग में जाकर बैठा करती थीं । सिद्धि-चमत्कारों में उनकी कोई श्रद्धा नहीं थी । ‘आत्मा ही ब्रह्म है’ यह उनकी निष्ठा थी और लोगों को समझाती भी यही थीं । उनके लिखने में अष्टावक्र गीता का प्रभाव अधिक रहता था । वे वाद-विवाद किसीसे करती नहीं थीं । कम-से-कम बोलती थीं । हर हालत में प्रसन्न रहती थीं । रूखा-सूखा जो मिले, खा लेती थीं । उन्होंने अपने पहनने-ओढ़ने के लिए भी किसीसे कोई कपड़ा-लत्ता नहीं माँगा । उनको देखने से ही पता चलता था कि शरीर को सँभालने के लिए उनकी ओर से कोई सावधानी नहीं थी । उनका देहभाव प्रायः छूट गया था ।

 

एक दिन माताजी से किसीने पूछा : ‘‘मृत्यु के बाद आप कहाँ जाओगी ?’’
उन्होंने तुरंत उत्तर दिया : ‘‘आना-जाना कहाँ है ? आत्मा ब्रह्म है, ब्रह्म के सिवाय कुछ नहीं ।’’
वृंदावन में श्री उड़िया बाबाजी महाराज के निर्वाण दिवस के उपलक्ष्य में उत्सव व श्रीमद्भागवत सप्ताह चल रहा था । माताजी ने पूरा सप्ताह श्रवण किया । भंडारे के दिन प्रातःकाल माँ ने कहा : ‘‘आज स्वप्न में बाबा का दर्शन हुआ और उन्होंने कहा कि अब तुम मेरे साथ चलो । मैंने उनसे कह दिया कि बस, अब मेरा यहाँ कोई काम नहीं है ।’’
उसी दिन बिना किसी तकलीफ के, बिना किसी छटपटाहट के उनके प्राण शांत हो गये ।1 वायु वायु से एक तो रहती ही है (व्यष्टि प्राण अर्थात् व्यक्ति के शरीर में स्थित प्राणवायु तथा समष्टि प्राण अर्थात् व्यापक प्राणवायु एक-दूसरे से जुड़ी या एकाकार रहती है), केवल देह का चेतनात्मा से संबंध टूट गया था । चेतनात्मा तो सदा शुद्ध-बुद्ध-मुक्त, अद्वितीय ब्रह्म है ही ।
1. न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति... उन (आप्तकाम महापुरुष) के प्राणों का उत्क्रमण (बाहर या ऊपर जाना) नहीं होता । (बृहदारण्यक उपनिषद् : 4.4.6)